! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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”तभी लेंगे शपथ ……..”

Posted On 10 Dec, 2017 Social Issues में

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”औरत ने जनम दिया मर्दों को
मर्दों ने उसे बाजार दिया .”
कैसी विडम्बना है जन्म देने वाली की ,जन्म देने का सम्मान तो मिलना दूर की बात है ,अपने प्यार के बदले में प्यार भी नहीं मिलता ,मिलती है क्या एक औलाद जो केवल मर्द की हवस को शांत करने का एक जरिया मात्र है और कुदरत से उसे मिलने वाला कहने को उपहार पर आज की दुनिया को देखा जाये तो यह न तो वरदान है और न ही उपहार .बेटों ने तो अपनी सार्थकता बहुत पहले ही साबित कर दी थी और बाकी ऐसे मर्मान्तक फ़िल्मी गानों ने कर दी और रही बेटियां तो वे अब अपनी सार्थकता साबित कर रही हैं .
बेटियां पराया धन होती हैं आरम्भ से ही बेटियों को यह कहकर पाला जाता है और इसीलिए बेटियों की माँ-बाप को लेकर कोई जिम्मेदारी नहीं होती पर फिर भी देखा गया है कि बेटियां अपने माँ-बाप का बहुत ध्यान रखती हैं और अपने माँ-बाप के साथ उनके दुःख की घड़ी में एक ढाल के समान खड़ी रहती हैं .बेटियां हमेशा से नरमदिल मानी जाती हैं और यह कोरी कल्पना ही नहीं है सच्चाई है .माँ-बाप का दिल रखने को अपने सारे अरमानों पर पत्थर रख लेने के बेटियों के बहुत सारे उदाहरण है .रामायण में जब सीता स्वयंवर चल रहा होता है तब जनक सुपुत्री सीता को स्वयम्वर में पधारे राजाओं में श्री राम के दर्शन होते हैं तब वे मन ही मन उन्हें अपना पति स्वीकार कर लेती हैं किन्तु ये इच्छा अपने माता-पिता के समक्ष प्रकट नहीं करती और माँ गौरी को मनाती हुई मन ही मन कहती हैं -
”मोर मनोरथु जानहु नीकेँ ,
बसहु सदा उर पुर सबहीं के ,
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं
अस कहि चरन गहे वैदेहीं .”
भावार्थ:-मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति जानती हैं, क्योंकि आप सदा सबके हृदय रूपी नगरी में निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजी ने उनके चरण पकड़ लिए॥2॥
ऐसे ही आज के युग में भी बहुत सी कन्यायें ऐसी रही हैं जिन्होंने अपने माँ-बाप की गरिमा को कायम रखा है .आशा भोंसले के घर से भागने के बाद पुत्री लता मंगेशकर ने ही अपने पिता दीनानाथ मंगेशकर को सहारा दिया और अपना सारा जीवन अपने पिता की सेवा में ही समर्पित कर दिया .
पर ऐसा नहीं है कि केवल पुत्रियां ही माता-पिता की सेवा करती हैं करते पुत्र भी हैं श्रवण कुमार भी पुत्र ही थे जिन्होंने अपने कन्धों पर बैठकर मात-पिता को तीर्थयात्रा कराई थी. श्री राम भी पुत्र ही हैं जिन्होंने अपने पिता राजा दशरथ के वचन पालन के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया था और समस्त राज-पाट का त्याग किया था लेकिन क्योंकि बात हो रही है बेटियों की तो बेटियों की ही बात की जाएगी और इनकी नरमदिली की जाँच भी ,माता-पिता के प्रति कर्तव्यपालन की पड़ताल भी .
आज कलियुग का दौर है. वह युग जिसमे अपने के नाम पर कोई अपना नहीं ,आदमी का कोई ईमान नहीं ,पैसा-सत्ता-ज़मीन-जायदाद बस ये ही आज के इंसान का धर्म है ,ईमान है .व्हाट्सप्प पर एक मेसेज आ रहा है कि
”एक लड़की ने फेसबुक पर एक मेसेज टैग किया कि,अगर माँ-बाप को संभालने का हक़ लड़कियों का होता तो भारत में एक भी वृद्धाश्रम नहीं होता ….
तो एक लड़के ने उस पर बड़ा ही सुन्दर जवाब दिया कि अगर हर लड़की ससुराल में अपने सास-ससुर को ही अपने माँ-बाप का दर्जा दे दे और घर के हर सुख-दुःख में शामिल रहे तो भारत में तो क्या पूरी दुनिया में भी वृद्धाश्रम नहीं रहेगा ”.
कितनी सही बात हम आज इन सोशल साइट्स पर पढ़ व् देख रहे हैं किन्तु नहीं अपनाते क्योंकि ये हवा जो कलियुग की सभी ओर बह रही है उससे हम बेटियां भी कैसे वंचित रह सकती हैं और इसी हवा का प्रभाव कहा जायेगा जब माँ-बाप को बेटी के रहते वृद्धाश्रम में रहना पड़ जाये ,बेटी के होते हुए माँ-बाप को कानून की सहायता से उससे भरण-पोषण मांगना पड़ जाये और बेटी जैसे ही बहू बन जाये तो सास को भी क़त्ल होना पड़ जाये ये सब कोरी कल्पना नहीं है वरन सत्य है जिसे आज कल के माँ-बाप भुगत रहे हैं .
डॉ.श्रीमती विजय मनोहर अरबाट बनाम कांशी राम राजाराम संवाई और अन्य में माँ-बाप ने बेटी से भरण-पोषण माँगा और रही सास के क़त्ल होने की बात तो अभी ७ दिन पहले शाहपुर के गांव काकड़ा में मौसम व् कोमल ने मिलकर मौसम की सास सरोज से झगड़ा होने पर बीच की बहन के पति को बीचबचाव करने पर धारदार हथियार से हमला कर मार डाला और ऐसा हुआ तब जब पूरे देश में नारी सशक्तिकरण सप्ताह मनाया जा रहा था सारा देश नारी सशक्तिकरण की शपथ ले रहा था और ये सब कार्य पुरुषों द्वारा बढ़-चढ़कर किया व् कराया जा रहा था .
ये सत्य है कि आज तक महिलाओं पर माँ-बाप की कोई जिम्मेदारी नहीं है .शुरू से पराया धन के नाम पर उन्हें ससुराल में विदा करने के लिए ही पाला जाता है और लड़के बचपन से ही यूँ तो माँ-बाप की आँख के तारे होते हैं किन्तु सारे घर की माँ की बाप की बहन की सारी जिम्मेदारी उन्ही पर होती है .इसलिए जिम्मेदारी निभाने का उनमे घमंड होता है और लड़कियों को कोमल बने रहने का वरदान मिला रहता है और यही कोमलता जब वे ससुराल में आ जाती हैं कर्कशता में बदल जाती है .सबमे नहीं पर अधिकांशतया में और ससुराल में आकर वे अपने सास ससुर को अपने माँ-बाप का स्थान नहीं दे पाती और इसी का परिणाम होता है बहू आने के बाद घर का टूटना .जो परिवार बहू आने तक एक थाली में खाता था वह बहू के आने के बाद एक छत के नीचे भी नहीं खा पाता और इसके बाद भी बेटियों की महानता के राग अलापे जाते हैं .जब वह अपने माँ-बाप के लिए अपनी भाभी से ये आशा रख सकती है कि वह उनका करे तो वह अपने सास-ससुर के साथ वह न्याय क्यों नहीं कर पाती ?
फिर कैसी नारी के सशक्तिकरण की शपथ ली गयी है जब वह अपने प्रकृति प्रदत्त गुणों का ही त्याग कर आगे बढ़ रही है .वह चोरी कर रही है .क़त्ल में सहयोग कर रही है .खुद क़त्ल कर रही है ,सब कहते हैं औरत का अपना कोई घर नहीं होता पर सब यह भी कहते हैं कि औरत बिना कोई घर घर नहीं होता ,नारी हीन घर भूतों का डेरा होता है ऐसा कहा जाता है और जैसे हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है वैसे ही एक नारी की सफलता उसके घर परिवार में बसती है उसकी सशक्तता तभी है जब उसका घर पूरी तरह से सुख से संपन्न हो और ये तभी होगा जब वह सही राहों पर चले .पुरुष वर्ग से लोहा ले किन्तु उसके गुणों पर चलकर नहीं बल्कि अपने प्रकृति प्रदत्त गुणों को अपनाकर .तभी ये कहा जायेगा और कहा जा सकेगा -
”पुरुषों से लड़ने की खातिर ,नारी अब बढ़ जाएगी ,
किसी काम में उससे पीछे नहीं कही अब जाएगी .
क्या खासियत है मर्दों में क्यों रहते उससे आगे
काम करेगी दिलोजान से मर्द-मार कहलाएगी .”

शालिनी कौशिक
[कौशल]



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
December 12, 2017

जय श्री राम शालनी जी ये बिलकुल सच है की बेटियाँ बेटो से ज्यादा माँ बाप की देख भाल करती है लेकिन जब बहु बन आ कर आती उनका रंग बदल जाता लगता समाज की हवा ही खराब हो गयी की बहुए और बेटे केवल जायदाद को लेने के फिराक में रहते सेवा आदर नाम की कोइ चीज नहीं पता नहीं समाज को क्या हो गया कुछ मामलो में बहु के माँ बाप भी सिखाते है.हम खुद भुगत रहे.हम ८२ साल के पिछले २२ सालो से बिस्तर पर है बड़े लड़के बहु ने कभी पूंछा तक नहीं छोटे ने बहुत सेवा की लेकिन शादी के बाद सब बदल गया चोटी बहु सास से बहुत ख़राब वर्ताव करती.हमारा मकान सस्ते में बिक गया थोड़ी से पैसे देता बाकी सब हमारी दोनों बेटियाँ देती जबकि मकान का जो भाग है दोने बेटे हिस्से के लिए तैयार है..आपने बहुत सुन्दर सामाजिक चित्र पेश किया लेकिन कुछ बदलेगा इसकी उम्मीद कम है.सुन्दर भावो के लिए धन्यवाद.

    December 12, 2017

    mere man kee bhavnaon ko aapne samjha hai aur aap isi sthiti ko jhel rahe hain jankar dukh hua meri post ko padhne v samjhne ke liye hardik dhanyaad aur sthiti badle iske liye dua karungi

Shobha के द्वारा
December 11, 2017

प्रिय शालनी जी आपका लेख पढ़ा में इमोशनल हो गयी मैने समाज में नजर दौडाई अनेक माता पिता हैं जिनका बेटियां ध्यान रखती हैं उन्हें बेटों की कमी महसूस ही नहीं होने देती मेरी बेटी विदेश में है विवाहित है उसने कहा मम्मा पापा जब आप अशक्त हो जाओगे मैं आपको ले जाऊँगी |ऐसी भावना कितनी अच्छी लगती है |बेटी से घर में रौनक रहती है |हमारी अपनी बच्ची में जान बसती है |मेरे पिता का देहांत बहुत पहले हो गया था लेकिन आज भी वह हमें पास लगते हैं हम भाई बहन उन्हें कभी नहीं भूले

    December 12, 2017

    shobha ji ,betiyan maa-baap ka karti hain main janti hun par ye hi betinyan jab bahu ban jati hain to ghar ke tootne ka karan kyun banti hain ,tab inki komal bhavnayen mar kyun jati hain mera kahna ye hai .lekh padhne ke liye aapka aabhar


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