! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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पटाखों बिना क्या शादी क्या चुनाव !

Posted On 6 Nov, 2017 Social Issues में

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image0चारो तरफ धुंआ ही धुंआ दिखाई दे रहा था आज सारे दिन और सूरज की रौशनी का कहीं नामो-निशान नहीं था .पहले तो सुबह सुबह यही लगता रहा कि या तो बादल हैं या कोहरा किन्तु जैसे जैसे दिन बढ़ा यह महसूस होने लगा कि यह न तो बादल का असर है न कोहरे का दुष्प्रभाव क्योंकि वह साफ तौर पर धुंआ नज़र आ रहा था और कारण के लिए पिछली रात में अपने कुत्ते जॉन्टी के भौंक-भौंक कर कमरे में अंदर करने की अनुनय विनय की ओर ध्यान गया और याद आया कि कल रात भी काफी सारे पटाखे छोड़े गए थे तब धुंआ होना स्वाभाविक था और फिर रही सही कसर आज के समाचारपत्रों की रिपोर्ट ने पूरा कर दिया जिसमे नगर पालिका चुनावों में आतिशबाजी के जबरदस्त इस्तेमाल के समाचार प्रकाशित थे .
अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली-एनसीआर में दिवाली के मौके पर पटाखों की बिक्री पर रोक लगाने पर काफी तीखी प्रतिक्रिया हमारे बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा व्यक्त की गयी थी चेतन भगत को मैं बुद्धिजीवी ही कहूँगी जिन्होंने महान उपन्यासकार होते हुए इस प्रतिबन्ध की आलोचना की पर उद्धव ठाकरे को मैं बुद्धिजीवी की श्रेणी में नहीं रखूंगी क्योंकि वे तो नेता हैं और नेता बुद्धिजीवी नहीं होते वे केवल छल-कपट जीवी होते हैं जो किसी भी तरह लोगों की भावनाओं को भड़का कर अपना हित साधने की कोशिश करते रहते हैं इसीलिए यहाँ केवल चेतन भगत की टिप्पणी आलोचना का अधिकार रखती है और उनसे ऐसी आशा नहीं की जा सकती कि वे पटाखे छोड़ने का समर्थन करेंगे क्योंकि दिवाली के मौके पर यहाँ पटाखे बहुत छोड़े जाते हैं और जो कि गलत समर्थन मिलने पर छोड़े भी गए अभी तो उनका धुंआ ही दूर नहीं हुआ था कि शादियों का सीज़न शुरू हो गया और शुरू हो गया हर्ष फायरिंग का दौर और इस सबका भी सर फोड़ चुनावी सीज़न आ गया बस अब तो हो गयी पर्यावरण की टांय-टांय-फिस्स .
वातावरण में धुंआ बढ़ता ही जा रहा है और अभी तो ये और बढ़ेगा क्योंकि यूपी में चुनाव २९ नवम्बर तक हैं और फिर जीत के पटाखे ,फिर शादी के पटाखे तो अभी देव डूबने तक फूटते ही रहेंगे फिर चाहे किसी बड़ी उम्र के व्यक्ति को या फिर छोटे बच्चे को इससे हार्ट-अटैक ही आ जाये ,प्रकृति के सारे प्राणियों की डर के मारे जान ही न निकल जाये और हमारा प्यारा कुत्ता जॉन्टी ”किसी तरह से मुझे अंदर कमरे में बंद कर लो ” कहकर भौंक-भौंक कर अपनी आज़ादी की तिलांजलि ही देता रह जाये .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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