! मेरी अभिव्यक्ति !

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कामकाजी महिलाएं और कानून

Posted On: 28 Oct, 2017 Social Issues में

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आज यदि देखा जाये तो महिलाओं के लिए घर से बाहर जाकर काम करना ज़रूरी हो गया है. इसका एक परिणाम तो यह हुआ है कि स्त्री सशक्तिकरण के कार्य बढ़ गए हैं. स्त्री के आगे बढ़ने में भी तेज़ी आई है, किन्तु इसके दुष्परिणाम भी कम नहीं हुए हैं. जहां एक तरफ महिलाओं को कार्यस्थल के बाहर के लोगों से खतरा बना हुआ है, वहीं कार्यस्थल पर भी यौन शोषण को लेकर उसे नित्य नए खतरों का सामना करना पड़ता है.


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कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी काफी सतर्कता बरती गयी है, किन्तु फिर भी इन घटनाओं पर अंकुश लगाया जाना संभव नहीं हो पाया है. इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय का ”विशाखा बनाम राजस्थान राज्य एआईआर १९९७ एससीसी ३०११” का निर्णय विशेष महत्व रखता है. इस केस में सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने महिलाओं के प्रति काम के स्थान में होने वाले यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए विस्तृत मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये हैं.


न्यायालय ने यह कहा कि ‘देश की वर्तमान सिविल विधियाँ या अपराधिक विधियाँ काम के स्थान पर महिलाओं के यौन शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त संरक्षण प्रदान नहीं करती हैं और इसके लिए विधि बनाने में काफी समय लगेगा. अतः जब तक विधानमंडल समुचित विधि नहीं बनाता है, न्यायालय द्वारा विहित मार्गदर्शक सिद्धांत को लागू किया जायेगा’.


न्यायालय ने यह भी निर्णय दिया कि ”प्रत्येक नियोक्ता या अन्य व्यक्तियों का यह कि काम के स्थान या अन्य स्थानों में चाहे प्राइवेट हो या पब्लिक, श्रमजीवी महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए समुचित उपाय करे. इस मामले में महिलाओं के अनु.१४,१९ और २१ में प्रदत्त मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विशाखा नाम की एक गैर सरकारी संस्था ने लोकहित वाद न्यायालय में फाइल किया था.


याचिका फाइल करने का तत्कालीन कारण राजस्थान राज्य में एक सामाजिक महिला कार्यकर्ता के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना थी. न्यायालय ने अपने निर्णय में निम्‍नलिखित मार्गदर्शक सिद्धांत विहित किये-


१- सभी नियोक्ता या अन्य व्यक्ति जो काम के स्थान के प्रभारी हैं उन्हें, चाहे वे प्राइवेट क्षेत्र में हों या पब्लिक क्षेत्र में,  अपने सामान्य दायित्वों के होते हुए महिलाओं के प्रति यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए समुचित कदम उठाना चाहिए.


अ- यौन उत्पीडन पर अभिव्यक्त रोक लगाना, जिसमें निम्न बातें शामिल हैं- शारीरिक  सम्बन्ध और प्रस्ताव, उसके लिए आगे बढ़ना, यौन सम्बन्ध के लिए मांग या प्रार्थना करना, यौन सम्बन्धी छींटाकशी करना, अश्लील साहित्य या कोई अन्य शारीरिक मौखिक या यौन सम्बन्धी मौन आचरण को दिखाना आदि.


ब- सरकारी या सार्वजानिक क्षेत्र के निकायों के आचरण और अनुशासन सम्बन्धी नियम या विनियमों में यौन उत्पीड़न रोकने सम्बन्धी नियम शामिल किये जाने चाहिए और ऐसे नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए समुचित दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए.


स- प्राइवेट क्षेत्र के नियोक्ताओं के सम्बन्ध में औद्योगिक नियोजन [standing order] अधिनयम १९४६ के अधीन ऐसे निषेधों को शामिल किया जाना चाहिए.


द- महिलाओं को काम, आराम, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान के सम्बन्ध में समुचित परिस्थितियों का प्रावधान होना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि महिलाओं को काम के स्थान में कोई विद्वेष पूर्ण वातावरण न हो, उनके मन में ऐसा विश्वास करने का कारण हो कि वे नियोजन आदि के मामले में अलाभकारी स्थिति में हैं.


२- जहां ऐसा आचरण भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य विधि के अधीन विशिष्ट अपराध होता हो, तो नियोक्ता को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध समुचित प्राधिकारी को शिकायत करके समुचित कार्यवाही प्रारंभ करनी चाहिए.


३- यौन उत्पीड़न की शिकार महिला को अपना या उत्पीड़नकर्ता  का स्थानांतरण करवाने का विकल्प होना चाहिए.


न्यायालय ने कहा कि ”किसी वृत्ति, व्यापार या पेशा के चलाने के लिए सुरक्षित काम का वातावरण होना चाहिए. प्राण के अधिकार का तात्पर्य मानव गरिमा से जीवन जीना है. ऐसी सुरक्षा और गरिमा की सुरक्षा को समुचित कानून द्वारा सुनिश्चित कराने तथा लागू करने का प्रमुख दायित्व विधान मंडल और कार्यपालिका का है, किन्तु जब कभी न्यायालय के समक्ष अनु.३२ के अधीन महिलाओं के यौन उत्पीड़न का मामला लाया जाता है, तो उनके मूल अधिकारों की संरक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत विहित करना, जब तक कि समुचित विधान नहीं बनाये जाते उच्चतम न्यायालय का संविधानिक कर्त्तव्य है.


इस प्रकार यदि इस निर्णय के सिद्धांतों को नियोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाया जायें तो श्रमजीवी महिलाओं की स्थिति में पर्याप्त सुधार लाया जा सकता है.



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