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मेमोरेंडम ऑफ़ फैमिली सेटलमेंट का महत्व

Posted On 8 Oct, 2017 Social Issues में

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संपत्ति का विभाजन हमेशा से ही लोगों के लिए सरदर्द, कलह व खून-खराबे से भरा रहा है। इसीलिए घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा से इसी कोशिश में रहे हैं कि यह दुखदायी कार्य हमारे सामने ही हो जाये. इस सबमें करार का बहुत महत्व रहा है. करार पहले लोग मौखिक भी कर लेते थे और कुछ समझदार लोग वकीलों से सलाह लेकर लिखित भी करते थे. मगर धीरे-धीरे जैसे धोखाधड़ी बढ़ती चली गयी वैसे ही करार का लिखित होना और निश्चित कीमत के स्टाम्प पर होना ज़रूरी सा हो गया.


अब लगभग सभी करार सौ रुपये के स्टाम्प पर होते हैं, क्योंकि सौ रुपये के स्टाम्प पर होने से करार का रजिस्टर्ड होना आसान हो जाता है. लेकिन इस सबके साथ एक बात यह भी है कि अब भी बहुत से करार ऐसे किये जा सकते हैं, जो लिख भी लिए जाएँ और उनका रजिस्टर्ड होना ज़रूरी भी न हो.


वैसे भी रजिस्ट्रेशन एक्ट, १९०८ की धारा १७ [२] कहती है कि ”१७ [२] [i ] किसी भी समझौता अभिलेख का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी नहीं है, किन्तु ऐसा नहीं है कि इस धारा को मानकर आप सभी जगह समझौते को रजिस्टर्ड कराने से बचें. वास्तव में मैं यहाँ पारिवारिक समझौते से विभाजन की बात कर रही हूँ, जिसके लिए कहा गया है कि विभाजन करार द्वारा भी हो सकता है, क्योंकि इच्छा की घोषणा इसकी मुख्य कसौटी है. अतः यह इच्छा पक्षकार करार द्वारा भी घोषणा कर सकते हैं.


अप्पुवीयर बनाम राम [१८६६] में कहा गया है कि यदि किसी करार के अंतर्गत पक्षकारों ने यह निश्चित किया है कि उनके हित पृथक-पृथक हो गए हैं, तो यह विभाजन होगा, चाहे संपत्ति का बंटवारा बाद में हो. इसी तरह पूरणदासी बनाम गोयल स्वामी १९३६ में प्रिवी कौंसिल ने कहा कि करार द्वारा विभाजन के लिए यह आवश्यक है कि पक्षकारों ने अपने हितों के तुरंत पृथक्करण की इच्छा व्यक्त की हो, अन्यथा ऐसे करार द्वारा विभाजन नहीं होगा.


राम बनाम खुरा, १९७१ में पटना उच्च न्यायालय ने कहा ”पृथक्करण की इच्छा को लिखित रूप देने वाला दस्तावेज पृथक्करण की मान्य साक्ष्य है.” अब ऐसे में बहुत से लोग ये मानने लगते हैं कि यह करार लिखित भी हो और रजिस्टर्ड भी तभी इसकी मान्यता है, जबकि कानून की, सुप्रीम कोर्ट व इलाहाबाद उच्च न्यायालय की राय थोड़ी अलग है.


हिन्दू विधि में विभाजन का करार मौखिक भी हो सकता है. यह आवश्यक नहीं है कि करार लिखित ही हो. करार लिखित हो या मौखिक हो, पृथक्करण की इच्छा स्पष्टरूपेण व्यक्त होनी चाहिए. नन्नी बनाम गीता १९५८ में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस विषय में महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी करता है.


इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ”यदि करार लिखित है तो उसका रजिस्ट्रीकरण आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह पृथक्करण के कृत्य का अभिलेख है. लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह पृथक्करण उनमें करार से पहले ही हो चुका हो जैसे कि आमतौर पर भारतीय परिवार मतलब हिन्दू परिवार अब अपने घर में अलग-अलग हिस्से बाँट लेते हैं और उनमें रहना शुरू कर देते हैं.


बस इस ज्ञापन में वे केवल अपनी याददाश्त के लिए उसे लिख लेते हैं और यही बात इसे रजिस्ट्रीकरण से मुक्त करने की सुप्रीम कोर्ट ने मानी है और इसीलिए कृष्णा बनाम रामनारायण में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने साफ किया कि परन्तु यदि संपत्ति का बंटवारा करार द्वारा किया गया है, तो करार की रजिस्ट्री आवश्यक है. विभाजन के करार के विधिक प्रभाव और परिणामों को पक्षकार किसी आचरण या कृत्य द्वारा नहीं बदल सकते है.


रजिस्ट्रीकरण से मुक्ति के सम्बन्ध में सूरज सिंह सैनी बनाम जिला जज गाजियाबाद में २३ जनवरी २००२ को माननीय न्यायाधीश एके योग जी ने कहा-
”in the present case the document filed by the landlord was to be a memorandum of family settlement by the respondent no.2 and consequently no registration was required and the said document was admissible in evidence.”


स्पष्ट है कि मेमोरेंडम ऑफ़ फैमिली सेटलमेंट का रजिस्ट्रेशन उक्त परिस्थितियों में ज़रूरी नहीं है और यह साक्ष्य में भी मान्य है. यही समझते हुए अभी हाल में ही नगरपालिका में दादा के नाम से पहले पोते के पिता के नाम में और फिर पोते द्वारा वारिसान सर्टिफ़िकेट दिलवाकर उसका अपने दादा की संपत्ति पर नाम चढ़वाने में सफलता पायी है.


पोते को इतना इसलिए करना पड़ा, क्योंकि उसके पिता ने लापरवाही की पर आप ऐसा न करें, अगर आपके पास मेमोरेंडम ऑफ़ फैमिली सेटलमेंट है जो किसी योग्य वकील द्वारा उपरोक्त परिस्थितियों को समझते हुए तैयार किया गया हो, तो फ़ौरन अमल में लाएं और कानूनी उलझनों से बचें.

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