! मेरी अभिव्यक्ति !

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मान गए भाई -भाजपाई ही देशभक्त:भाजपाई ही रामभक्त

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” महफ़िल में मुझे गलियां देकर है बहुत खुश ,
जिस शख्स पर मैंने कई एहसान किये हैं .”

राहत ”इंदौरी ” का यह शेर राहत के दिल को भले ही दुनिया को दिखाने को  भले ही स्वान्तः सुखाय रचना के आधार पर राहत दे दे लेकिन ह्रदय की टीस को ,दिल की कसक को ज़ाहिर कर देता है हर एक उस मुसलमान की जो इस देश पर सब कुछ अपना कुर्बान करने के बाद भी उपेक्षितों की श्रेणी में बैठा है ,आतंकवादियों की कतार में खड़ा है .

ये देश जो हमेशा से ”वसुधैव कुटुम्बकम ” की संज्ञा से विभूषित रहा ,जिसने हर मेहमान का आगे बढ़कर स्वागत किया , इस देश में आने वाली हर संस्कृति को आँगन की तुलसी का स्थान दे पूज्यनीय दर्जा दिया और खुद पर जरा सा एहसान करने वाले पर अपनी जान तक न्यौछावर करने से भी नहीं हिचका,आज उस देश में भाजपा जैसी पार्टी और इसके नेताओं जैसे क्रांतिवीर ही देशभक्ति व् रामभक्ति के मालिक हो गए हैं .पश्चिमी दिल्ली के भाजपा संसद प्रवेश वर्मा कहते हैं -” भाजपा एक देशभक्त पार्टी है इसलिए मुसलमान कभी इसे वोट नहीं देते हैं .”

देश में ऐसी देशभक्ति नहीं देखी जैसी भाजपाइयों की है और न ही ऐसी रामभक्ति जैसी भाजपा के अनुयायियों  की है आलम ये है कि भाजपाई स्वयं पर घमंड करने में इतने चूर हैं कि यदि कोई मोदी की इनके सामने बुराई कर दे और अभिवादन में यदि वह ” राम-राम” या ”जय सिया राम ” कह दे तो उसे एकदम पलटकर कहते हैं ” ये शब्द तेरे मुंह से अच्छा नहीं लगता ” जैसे राम शब्द इनका पेटेंट हो गया हो या भगवान ने बस भाजपा वालों को या मोदी को चाहने वालों को ही राम शब्द के उच्चारण की इज़ाज़त दी हो .

तात्पर्य बस इतना भर है कि इस वक़्त देश में भाजपा की सरकार है , भाजपा के मोदी की तूती बोल रही है प्रभाव उसका यह पड़ रहा है कि ”हर अच्छा काम इनका हर अच्छा नाम इनका ” देशभक्त भी यही ,राम भक्त भी यही ,भले ही न देश को जाने न राम को और ये हाल तब जब स्वतंत्रता संग्राम में भाजपा के किसी बड़े नेता का जेल तक जाने का कोई इतिहास नहीं और जिनका जेल जाने का इतिहास है भी ,उनका ऐसा कि पढ़कर शर्म आ जाये .

भाजपा के पहले प्रधानमंत्री ,देश के एक भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के बारे में यह जानकारी उनका विकिपीडिया ही देता है .जहाँ लिखा है -

EARLY POLITICAL CAREER (1942–1975)[EDIT]

Vajpayee’s first exposure to politics was in August 1942, when he and his elder brother Prem were arrested for 23 days during the Quit India movement, when he was released only after giving a written undertaking, expressly declaring not to participate in any of the anti-British struggle.[9]

प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी कहते हैं -

” तुम्हारी राह में मिटटी के घर नहीं आते ,
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते .”

कितना सही कहा है और कितना दर्द छुपा है इन पंक्तियों में शायर की जिसे केवल वह समझ सकता है ,महसूस कर सकता है जो मिटटी के घर में रहा हो अर्थात उन परिस्थितयों से गुज़रा हो जिनसे एक देश प्रेमी होते हुए भी गद्दार की उपाधि से विभूषित मुसलमान जिसे हम चक दे इंडिया के कोच कबीर खान के दिल पर गुज़रते हुए देख सकते हैं .

एक कौम जिसका इतिहास स्वतंत्रता संग्राम में बलिदानों से भरा पड़ा है उसे दहशत गर्दों की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया है गद्दार बताया जा रहा है ,शर्म आनी चाहिए  हमें खुद पर जो कद्रदानों की श्रेणी से निकलकर एहसान फरामोशों की श्रेणी में लुढकते जा रहे हैं .देश का स्वतंत्रता संग्राम बलिदानों से भरा पड़ा है और उन बलिदानों में बहुत बड़ी संख्या में हमारे मुस्लिम भाई-बहनों के बलिदान भी हैं जिन्हें यदि हम नज़रअंदाज़ करते हैं तो हम एहसान फरामोश हैं .
इतिहास के पन्नों में अनगिनत ऐसी हस्तियों के नाम दबे पड़े हैं जिन्हो ने भारतीय स्वतंत्रा आंदोलन में अपने जीवन का बहुमूल्य योगदान दिया जिनका ज़िक्र भूले से भी हमें सुनने को नहीं मिलता? जबकि अंग्रेजों के खिलाफ भारत के संघर्ष में मुस्लिम क्रांतिकारियों, कवियों और लेखकों का योगदान प्रलेखित है|
Bahadur shah zafar 1857 movement
बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे औरउर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857  का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई।पहली जंगे आजादी के महान स्वतंत्र सेनानी अल्लामा फजले हक खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा दिया था ! इस फतवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला और अज़ीम जंगे आजादी लड़ी !
अँगरेज़ इतिहासकार लिखते हैं की इसके बाद हजारों उलेमाए किराम को फांसी ,सैकड़ों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया था और बहुतसों को काला पानी की सजा दी गयी थी! अल्लामा फजले हक खैराबादी को रंगून में काला पानी में शहादत हासिल हुई !
यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।
silk letter movement (Reshmi Rumal)
आजादी के आंदोलन में विश्वप्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देवबंद का योगदान भी कम नहीं रहा। यहां से शुरू हुआ ‘तहरीक-ए-रेशमी रुमाल’ ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इसके तहत रुमाल पर गुप्त संदेश लिखकर इधर से उधर भेजे जाते थे, जिससे अंग्रेजी फौज को आंदोलन के तहत की जाने वाली गतिविधियों की खबर नहीं लग सके। तहरीक रेशमी रुमाल शुरू कर जंग-ए-आजादी में अहम भूमिका निभाई।
Deoband Ulema’s movement
दारुल उलूम देवबन्द की आधारशिला 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना क़ासिम नानौतवी द्वारा रखी गयी थी। वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक उथल-पुथल व तनाव का समय था, उस समय अंग्रेज़ों के विरूद्ध लड़े गये प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई.) की असफलता के बादल छंट भी न पाये थे और अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति दमनचक्र तेज़ कर दिया गया था, चारों ओर हा-हा-कार मची थी। अंग्रेजों ने अपनी संपूर्ण शक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन (1857) को कुचल कर रख दिया था। अधिकांश आंदोलनकारी शहीद कर दिये गये थे, (देवबन्द जैसी छोटी बस्ती में 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था) और शेष को गिरफ्तार कर लिया गया था, ऐसे सुलगते माहौल में देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानियों पर निराशाओं के प्रहार होने लगे थे। चारो ओर खलबली मची हुई थी। एक प्रश्न चिन्ह सामने था कि किस प्रकार भारत के बिखरे हुए समुदायों को एकजुट किया जाये, किस प्रकार भारतीय संस्कृति और शिक्षा जो टूटती और बिखरती जा रही थी, की सुरक्षा की जाये। उस समय के नेतृत्व में यह अहसास जागा कि भारतीय जीर्ण व खंडित समाज उस समय तक विशाल एवं ज़ालिम ब्रिटिश साम्राज्य के मुक़ाबले नहीं टिक सकता, जब तक सभी वर्गों, धर्मों व समुदायों के लोगों को देश प्रेम और देश भक्त के जल में स्नान कराकर एक सूत्र में न पिरो दिया जाये। इस कार्य के लिए न केवल कुशल व देशभक्त नेतृत्व की आवश्यकता थी, बल्कि उन लोगों व संस्थाओं की आवश्यकता थी जो धर्म व जाति से उपर उठकर देश के लिए बलिदान कर सकें।
इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों व संस्थानों ने धर्मनिरपेक्षता व देशभक्ति का पाठ पढ़ाया उनमें दारुल उलूम देवबन्द के कार्यों व सेवाओं को भुलाया नहीं जा सकता।
शेखुल हिन्द की अंग्रेजों के विरूद्ध तहरीके-रेशमी रूमाल, मौलाना मदनी की सन 1936 से सन 1945 तक जेल यात्रा, मौलाना उजै़रगुल, हकीम नुसरत, मौलाना वहीद अहमद का मालटा जेल की पीड़ा झेलना, मौलाना सिंधी की सेवायें इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण हैं कि दारुल उलूम ने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई है। इस संस्था ने ऐसे अनमोल रत्न पैदा किये जिन्होंने अपनी मात्र भूमि को स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा दिया। ए. डब्ल्यू मायर सियर पुलिस अधीक्षक (सीआई़डी राजनैतिक) पंजाब ने अपनी रिपोर्ट नं. 122 में लिखा था जो आज भी इंडिया आफिस लंदन में सुरक्षित है कि ”मौलाना महमूद हसन (शेखुल हिन्द) जिन्हें रेशमी रूमाल पर पत्र लिखे गये, सन 1915 ई. को हिजरत करके हिजाज़ चले गये थे, रेशमी ख़तूत की साजिश में जो मौलवी सम्मिलित हैं, वह लगभग सभी देवबन्द स्कूल से संबंधित हैं।
उड़ीसा के गवर्नर श्री बिशम्भर नाथ पाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि दारुल उलूम देवबन्द भारत के स्वतंत्रता संग्राम में केंद्र बिन्दु जैसा ही था, जिसकी शाखायें दिल्ली, दीनापुर, अमरोत, कराची, खेडा और चकवाल में स्थापित थी। भारत के बाहर उत्तर पशिमी सीमा पर छोटी सी स्वतंत्र रियासत ”यागि़स्तान“ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र था, यह आंदोलन केवल मुसलमानों का न था बल्कि पंजाब के सिक्खों व बंगाल की इंकलाबी पार्टी के सदस्यों को भी इसमें शामिल किया था।
इसी प्रकार असंख्यक तथ्य ऐसे हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दारुल उलूम देवबन्द स्वतंत्रता संग्राम के पश्चात भी देश प्रेम का पाठ पढ़ता रहा है जैसे सन 1947 ई. में भारत को आज़ादी तो मिली, परन्तु साथ-साथ नफरतें आबादियों का स्थानांतरण व बंटवारा जैसे कटु अनुभव का समय भी आया, परन्तु दारुल उलूम की विचारधारा टस से मस न हुई। इसने डट कर इन सबका विरोध किया और इंडियन नेशनल कांग्रेस के संविधान में ही अपना विश्वास व्यक्त कर पाकिस्तान का विरोध किया तथा अपने देशप्रेम व धर्मनिरपेक्षता का उदाहरण दिया। आज भी दारुल उलूम अपने देशप्रेम की विचार धारा के लिए संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है।
khudai khidmatgar movement
लाल कुर्ती आन्दोलन भारत में पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ानद्वाराभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन में खुदाई ख़िदमतगार के नाम से चलाया गया। विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी। उसके बाद उन्हें यातनाओं की झेलने की आदत सी पड़ गई। जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से जोड़ने के लिए ‘ख़ुदाई ख़िदमतग़ार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आन्दोलनों को और भी तेज़ कर दिया।
1937 में नये भारत सरकार अधिनियम के अन्तर्गत कराये गए चुनावों में लाल कुर्ती वालों के समर्थन से काँग्रेस पार्टी को बहुमत मिला और उसने गफ्फार खान के भाई खान साहब के नेतृत्व में मन्त्रिमण्डल बनाया जो बीच का थोड़ा अन्तराल छोड़कर 1947 में भारत विभाजन तक काम करता रहा। इसी वर्ष सीमान्त प्रान्त को भारत और पाकिस्तान में से एक में विलय का चुनाव करना पड़ा। उसने जनमत संग्रह के माध्यम से पाकिस्तान में विलय का विकल्प चुना। खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी के रूप में प्रसिद्ध) एक महान राष्ट्रवादी थे जिन्होंने अपने 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताया;
वर्ष 1905 के बंग-भंग विरोधी जनजागरण से स्वदेशी आन्दोलन को बहुत बल मिला। यह 1911 तक चला और गान्धीजी के भारत में पदार्पण के पूर्व सभी सफल अन्दोलनों में से एक था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद  , अरविन्द घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य उद्घोषक थे।आगे चलकर यही स्वदेशी आन्दोलन महात्मा गांधी के स्वतन्त्रता आन्दोलन का भी केन्द्र-बिन्दु बन गया। उन्होने इसे “स्वराज की आत्मा” कहा। इस आंदोलन का प्रचार सैय्यद हैदर रज़ा ने दिल्ली में किया।
विश्वयुद्ध के पश्चात् हुई कई अन्य घटनाओं ने भी हिन्दू-मुस्लिम राजनीतिक एकीकरण के लिये एक व्यापक पृष्ठभूमि तैयार की-
1 लखनऊ समझौता (1916)- इससे कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में सहयोग बढ़ा।
2 रौलेट एक्ट के विरुद्ध प्रदर्शन में समाज के अन्य वर्गों के साथ ही हिन्दू तथा मुसलमान भी एक-दूसरे के करीब आ गये।
3 मौलिक राष्ट्रवादी मुसलमान जैसे-  मौलाना अबुल कलाम आजाद,मौलाना उबैदुल्लाह सिन्धी, हकीम अजमल खान, हसरत मोहनी डा। सैयद महमूद, हुसैन अहमद मदनी, प्रोफेसर मौलवी बरकतुल्लाह, डॉ॰ जाकिर हुसैन, सैफुद्दीन किचलू, वक्कोम अब्दुल खदिर, डॉ॰ मंजूर अब्दुल वहाब, बहादुर शाह जफर, हकीम नुसरत हुसैन, खान अब्दुल गफ्फार खान, अब्दुल समद खान अचकजई, शाहनवाज कर्नल डॉ॰ एम॰ ए॰ अन्सरी, रफी अहमद किदवई, फखरुद्दीन अली अहमद, अंसार हर्वानी, तक शेरवानी, नवाब विक़रुल मुल्क, नवाब मोह्सिनुल मुल्क, मुस्त्सफा हुसैन, वीएम उबैदुल्लाह, एसआर रहीम, बदरुद्दीन तैयबजी , आदि उनमे प्रमुख नाम हैं.
शाहजहाँपुर उत्तर प्रदेश के अशफाक उल्ला खाँ वारसी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्होंने काकोरी काण्ड में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसम्बर सन् 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फाँसी पर लटका कर मार दिया गया। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के सम्पूर्ण इतिहास में ‘बिस्मिल’ और ‘अशफाक’ की भूमिका निर्विवाद रूप से हिन्दू-मुस्लिम एकता का अनुपम आख्यान है।
Provisional Government of Free India (Azad Hind)
सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्ला सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरूद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की सर्वप्रथम स्वंतत्र सरकार स्थापित की जिसका राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप को बना गया। आज़ाद हिन्द फ़ौज सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान में बनायी थी। मूलत: यह ‘आजाद हिन्द सरकार’ की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी। किन्तु इस लेख में जिसे ‘आजाद हिन्द फौज’ कहा गया है उससे इस सेना का कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ, नाम और उद्देश्य दोनों के ही समान थे। रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया अर्थात् आज़ाद हिन्द फ़ौज। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी। इस फ़ौज में मुसलमानो की बड़ी तादाद थी , जिसमे कुछ नाम आबिद हसन , अमीर हमज़ा ,शाहनवाज़ खान , अब्बास अली , निज़ामुद्दीन खान ई हैं .(dandi March
Quit India Movement
केरल के अब्दुल वक्कोम खदिर ने 1942 के ‘भारत छोड़ो’ में भाग लिया और 1942 में उन्हें फांसी की सजा दी गई थी, उमर सुभानी जो की बंबई की एक उद्योगपति करोड़पति थे, उन्होंने गांधी और कांग्रेस व्यय प्रदान किया था और अंततः स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को कुर्बान कर दिया।
मुसलमान महिलाओं में हजरत महल, अस्घरी बेगम, बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है.
अफ़सोस आज हमें उन लोगों की कुर्बानी बिलकुल भी याद नहीं रही, याद रहा तो सिर्फ एक ही नाम जो मुस्लिम कटआउट की तरह जहाँ देखो वहीं दिखाई देता है ?
जिसे देखकर हम ने भी यही समझ लिया कि मुसलमानो में सिर्फ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद  ही एक थे जिनका एकमात्र नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हुआ है , मौलाना आजाद  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता और हिन्दू मुस्लिम एकता की वकालत करने वाले थे….![ASSAM123.COM से साभार ]
और रही बात राम नाम के उच्चारण की तो इस देश में गंगा -जमुनी तहज़ीब रही है .हिंदुओं व् मुसलमानों ने अपने अपने त्यौहार मिलजुल कर मनाये हैं .दीवाली की मिठाई व् ईद की सिवइयां हिंदुओं व् मुसलमानों के प्यार की प्रतीक रही हैं.
असत्य पर सत्य की विजय का त्योहार विजयदशमी पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है । ऐसे में देश के तमाम शहरों में रामलीला समितियों द्वारा रामलीला का मंचन होता  है। धर्म की नगरी काशी में अनादिकाल से होती चली आ रही रामनगर की रामलीला आज भी होती  है वहीं जिले के फुलवरिया गांव में गंगा  जमुनी तहज़ीब की मिसाल रामलीला आज से 50 साल पहले मरहूम नसीमुद्दीन ने गांव के लोगों को साथ मिलकर शुरू की थी। पेश है फुलवरिया गांव से इस अनोखी रामलीला पर टीम iamin की खास रिपोर्ट।
”अध्यात्म और धर्म की नगरी में इस वक्त दशहरे की धूम है। चारों तरफ रामलीला समितियां राम की लीला का मंचन करने में व्यस्त हैं। ऐसे ही एक रामलीला समिति है नवचेतना कला एवं विकास समिति जिसमें मुस्लिम भाई अपना योगदान शुरूआती दिनों से देते आ रहे हैं। इस संस्था के संस्थापक सदस्य डॉ. शिव कुमार गुप्त ने बताया, “इस रामलीला की शुरूआत सन 1952 में मुस्लिम समुदाय के मरहूम नसीमुद्दीन ने की थी। यहां लीला का मंचन हिन्दू-मुसलमान सभी मिलकर करते हैं। इस गांव की रामलीला की सबसे खास बात यह है की रामलीला के सभी पात्र और शृंगार करने वाले, व्यास मंडली, सजावट करने वाले सभी गांव के ही सदस्य हैं।”
संस्था के सदस्य और पिछले दस सालों से राजा दशरथ के मंत्री सुमंत का किरदार निभाने वाले मोहम्मद बारी ने बताया, “असत्य पर सत्य की जीत का यह त्योहार हमारे देश में तहज़ीब की मिसाल पेश कर रहा है। आज दस साल हो गए रामलीला में इस किरदार को निभाते हुए, इससे मुझे सुख की प्राप्ति होती है। गांव के सभी समुदाय के सदस्य रामलीला के  आयोजन में मुख्य भूमिका निभाते हैं। इस लीला के सभी पात्र और
सहयोगी  गांव के ही हैं।”
हिन्दू-मुस्लिम भाई चारे की प्रतीक नवचेतना कला एवं विकास समिति पूरे देश को आपसी भाई चारे का संदेश दे रही है। जब शहर अन्याय प्रतिकार की आंच से खामोश सा है ऐसे में शहर से चंद कदमों की दूरी पर रामदशरथ वियोग पर हिन्दू-मुसलमान एक साथ नम आंखों से इस वियोग के मंचन के साथ उसे देख भी रहे हैं।
पर नहीं दिखता है तो  उन्हें जो अपनी आँखों पर स्वयं के ही सर्वश्रेष्ठ होने का चश्मा लगाए हैं ,स्वयं के ही देशभक्त होने की धूनी रमाये हैं और अपने को ही रामभक्त कह भरमाये हुए हैं नहीं जानते ये भेद तो उनके प्रिय राम ने कभी नहीं किया जो कर वे भेदभाव की दीवार खड़ी कर रहे हैं उस सुगंध को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं जो इस देश के कोने कोने में फैली है और जिसे छिपाने की अनुमति न ये देश दे सकता है और न ही राम -
”कैंची से चिरागों की लौ काटने वालों ,
सूरज की तपिश को रोक नहीं सकते ,
तुम फूल को चुटकी से मसल सकते हो ,
पर फूल की खुशबु समेट नहीं सकते .”

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajiv Kumar Ojha के द्वारा
December 26, 2016

शालिनी जी आपने बहुत सटीक विश्लेषण किया है .२०१४ से भारतीय राजनीती पतन के एक अजीबोगरीब दौर से गुजर रही है .इस देश के लोकतंत्र को पेड़ और मैनेज्ड मीडिया के कंधे पर सबार कार्पोरेट घरानों के इशारे पर नाचने वाला ऐसा प्रधान मंत्री मिला जिसने अंधभक्तों की ऐसी फ़ौज कड़ी कर ली है जिसे हर वह व्यक्ति देश द्रोही ,कांग्रेसी ,वामपंथी नजर आता है जो इनके छद्म पर सबाल करे .नोटबंदी पर सदन में किस तरह सत्ता का नंगा नाच हुआ आपने देखा होगा, आप पढियेगा मेरा ब्लॉग( संसद की हार : सत्ता के नंगे नाच के नाम रहा सत्र Posted On: 16 Dec, 2016 को जागरण जंक्शन में प्रकाशित) आज लोकतंत्र खतरे में है और यह देश भी .


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