! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

678 Posts

2148 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12172 postid : 753078

उच्चतम न्यायालय आम आदमी को न्याय से तोड़े नहीं .

Posted On: 26 Mar, 2015 Others,social issues,Celebrity Writer में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

उच्चतम न्यायालय आम आदमी को न्याय से तोड़े नहीं .
” एफ. आई.आर .के लिए यूँ ही नहीं जा सकेंगे अब मजिस्ट्रेट के पास ” माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय देकर धारा १५६ [३] में आम आदमी से जुडी न्याय की आस को भी उससे चार कदम और दूर कर दिया .
धारा १५६ [३] दंड प्रक्रिया संहिता की वह धारा है जिसके सहारे आम आदमी जो कि किसी अपराध का पीड़ित है और पुलिसिया कार्यवाही और तरीके से परेशान है वह अपनी परेशानी लेकर मजिस्ट्रेट तक पहुँच जाता है लेकिन अब उससे उसका यह सहारा भी उच्चतम न्यायलय ने छीन लिया है .धारा १५६[३] धारा १९० में सशक्त किये गए मजिस्ट्रेट को पुलिस अधिकारी के समान अन्वेषण या आदेश का अधिकार देती है और यह अधिकार उसे तब मिलता है जब पीड़ित पहले अपनी एफ .आई. आर. को दर्ज कराने को पहले सम्बंधित थाने में भटकता है फिर वहां से निराश होकर एस.पी. को अपनी दरखास्त भेजता है और जब वहां से भी कोई कार्यवाही नहीं होती तब थक-हारकर कानून की शरण में आता है और मजिस्ट्रेट के पास अपनी शिकायत ले जाता है .अब उच्चतम न्यायालय ने इसमें भी उसकी आवेदन के साथ हलफनामा अर्थात शपथ पत्र जोड़ दिया है जिसमे वह इस बात की शपथ लेगा कि अगर उसकी शिकायत झूठी पायी जाये तो उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाएगी जबकि कानून में पहले ही ऐसी व्यवस्थाएं हैं कि इस हलफनामे की बाध्यता यहाँ जोड़े जाने का कोई औचित्य ही नहीं है .
भारतीय दंड संहिता की धारा १७७ किसी लोक सेवक को मिथ्या इत्तिला देने पर छह माह का सादा कारावास और एक हज़ार रूपये तक के जुर्माने का दंडादेश देती है और यदि इत्तिला देने वाला उसके लिए वैध रूप से आबद्ध होने पर भी मिथ्या इत्तिला देता है तब दो वर्ष तक के दोनों भांति का कारावास से व् जुर्माने का दंडादेश देती है .
जब हमारे देश का कानून पहले ही इस सम्बन्ध में व्यवस्था कर चूका है तब यहाँ और बाध्यताएं जोड़कर आम आदमी के लिए पीड़ित होने पर न्याय की राह में ऐसी व्यवस्थाएं कांटे बोना ही कही जाएँगी अगर कोई व्यवस्था वास्तव में होनी चाहिए तो वह यह है कि पुलिस सभी एफ.आई.आर. दर्ज करे और अपने स्तर से निष्पक्ष व् तुरंत जांचकर मामले की तह तक पहुंचे ऐसे आदेश उच्चतम न्यायालय को कर आम आदमी के लिए न्याय की राहें खोलने का भगीरथ प्रयत्न करना चाहिए न कि नए से नए कार्यवाही के तरीके थोपकर उसका न्याय व्यवस्था से विश्वास तोड़ने का यत्न .
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 27, 2015

प्रिय शालनी जी आप सदैव कानून सम्बन्धी जानकारियाँ देती हैं उसे आप बहुत आसान भाषा में देती हैं जिसे आम व्यक्ति भी समझ जाए इसी तरह आप वसीयत के संबंध में भी पाठकों को ज्ञान दे उनको बहुत लाभ होगा


topic of the week



latest from jagran