! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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मौके -बेमौके ''शालिनी''ने भी कोशिश ये की है .

Posted On: 24 Feb, 2015 Others,कविता,Celebrity Writer में

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बात न ये दिल्लगी की ,न खलिश की है ,
जिंदगी की हैसियत मौत की दासी की है .
………………………………………………………….
न कुछ लेकर आये हम ,न कुछ लेकर जायेंगें ,
फिर भी जमा खर्च में देह ज़ाया की है .
……………………………………………………………
पैदा किया किसी ने रहे साथ किसी के ,
रूहानी संबंधों की डोर हमसे बंधी है .
………………………………………………………………
नाते नहीं होते हैं कभी पहले बाद में ,
खोया इन्हें तो रोने में आँखें तबाह की हैं.
………………………………………………………….
मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते ,
सोचते इस पर फ़तेह हमने हासिल की है .
……………………………………………………………
जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी ,
मौके -बेमौके ”शालिनी”ने भी कोशिश ये की है .
…………………………………………………………………
शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
March 16, 2015

मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते , सोचते इस पर फ़तेह हमने हासिल की है . …………………………………………………………… जिंदगी गले लगा कर मौत से भागें सभी , मौके -बेमौके ”शालिनी”ने भी कोशिश ये की है . बहुत सुन्दर भाव …काश ये बातें लोग जान सकें तो बात ही बन जाए ….बधाई भ्रमर ५

Shobha के द्वारा
March 1, 2015

प्रिय शालनी आपकी प्यारी कविता जिस दिन आई उसी दिन मैने पढ़ ली थी परन्तु प्रतिक्रिया नहीं पहुंच सकी शायद यहां का सर्वर खराब था जिंदगी गले लगाकर मोत से भागे सभी सच्चाई हैं डॉ शोभा

rajanidurgesh के द्वारा
March 1, 2015

शालिनीजी बहुत सुन्दर .अतुलनीय. मौत से हम भागने की या अपने को छलने की प्रक्रिया करते ही रहते है.

deepak pande के द्वारा
February 25, 2015

मौत के मुहं में समाती रोज़ दुनिया देखते , सोचते इस पर फ़तेह हमने हासिल की है . वाह बहुत खूब शालिनी जी


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