! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

677 Posts

2148 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12172 postid : 815443

मोदी सरकार :जीने का अधिकार दे मरने का नहीं!

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मोदी सरकार :जीने का अधिकार दे मरने का नहीं!

धारा 309 -भारतीय दंड संहिता ,एक ऐसी धारा जो अपराध सफल होने को दण्डित न करके अपराध की असफलता को दण्डित करती है .यह धारा कहती है-
” जो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और उस अपराध को करने के लिए कोई कार्य करेगा ,वह सादा कारावास से ,जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से ,या दोनों से दण्डित किया जायेगा .”
और इस धारा की यही प्रकृति हमेशा से विवादास्पद रही है और इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने पी.रथिनम् नागभूषण पटनायिक बनाम भारत संघ ए .आई .आर .१९९४ एस.सी.१८४४ के वाद में दिए गए अपने ऐतिहासिक निर्णय में दंड विधि का मानवीयकरण करते हुए अभिकथन किया है कि-
”व्यक्ति को मरने का अधिकार प्राप्त है .”
इस वाद में दिए गए निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने इसे संविधान के अनुच्छेद २१ के अंतर्गत व्यक्ति को प्राप्त वैयक्तिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण मानते हुए इस धारा को दंड विधि से विलोपित किये जाने को कहा .विद्वान न्यायाधीशों ने धारा ३०९ के प्रावधानों को क्रूरतापूर्ण एवं अनुचित बताते हुए कहा कि इसके परिणामस्वरुप व्यक्ति को दोहरा दंड भुगतना पड़ता है .प्रथम तो यह कि वह आत्महत्या करने की यंत्रणा भुगतता है और आत्महत्या करने में असफल रहने पर उसे समाज में अपकीर्ति या बदनामी भुगतनी पड़ती है जो काफी पीड़ादायक होती है .ऐसी स्थिति में आत्महत्या के प्रयत्न में विफलता के लिए व्यक्ति को दण्डित करना उस पर एक और दंड का भार डालना होगा ,जो उचित नहीं है .अतः दंड संहिता की धारा ३०९ के उपबंध संविधान के अनुच्छेद २१ के प्रावधानों के विपरीत होने के कारण शून्य हैं .इस धारा को विलोपित किया जाना न केवल मानवीय आधार पर उचित होगा अपितु समाजशास्त्रीय दृष्टि से भी वांछित है क्योंकि वह व्यक्ति जिसने आत्महत्या करने के प्रयास किया था परन्तु वह इसमें विफल रहा हो ,अपने परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध होने के लिए एक बार पुनः उपलब्ध रहता है ,जैसा कि वह पूर्व में था .
इस निर्णय के आलोक में हम धारा ३०९ को शून्य ठहराते हैं और असंवैधानिक मानते हैं और ऐसे ही निर्णय को दृष्टिगोचर रखते हुए केंद्रीय सरकार विधि आयोग की सिफारिश पर व् १८ राज्यों व् ४ केंद्रशासित क्षेत्र की सहमति पर धारा ३०९ को ख़त्म करने का निर्णय ले रही है किन्तु यदि हम लोकेन्द्र सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य ए.आई .आर.१९९६ एस.सी.९४६ का अवलोकन करते हैं तो अपनी सोच को विस्तृत रूप दे पायेंगें और इस धारा को इस संहिता में स्थान देने का सही मकसद समझ पाएंगे .पी.रथिनम् का निर्णय जहाँ २ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया है वहीँ इस केस का निर्णय पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दिया है जिससे इस निर्णय की उस निर्णय पर वरीयता व् प्रमुखता स्वयं ही बढ़ जाती है .इस मामले में पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ ने विनिश्चित किया -”कि जब कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तब उसे कुछ सुस्पष्ट व्यक्त कार्य करने होते हैं और उनका उद्गम अनुच्छेद २१ के अंतर्गत ”प्राण के अधिकार ”के संरक्षण में नहीं खोजा जा सकता अथवा उसमे सम्मिलित नहीं किया जा सकता .”प्राण की पवित्रता ”के महत्वपूर्ण पहलु की भी उपेक्षा नहीं की जानी होगी .अनुच्छेद २१ प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करने वाला उपबंध है तथा कल्पना की किसी भी उड़ान से प्राण के संरक्षण में ‘ में ”प्राण की समाप्ति ” शामिल होने का अर्थ नहीं लगाया जा सकता .किसी व्यक्ति को आत्महत्या करके अपना प्राण समाप्त करना अनुज्ञात करने का जो भी दर्शन हो ,उसमे गारंटी किया हुआ मूल अधिकार के भाग के रूप में ”मरने का अधिकार ”सम्मिलित है ,ऐसा अनुच्छेद २१ का अर्थान्व्यन करना हमारे लिए कठिन है .अनुच्छेद २१ में निश्चित रूप से व्यक्त ”प्राण का अधिकार ” नैसर्गिक अधिकार है किन्तु आत्महत्या प्राण की अनैसर्गिक समाप्ति अथवा अंत है और इसलिए प्राण के अधिकार की संकल्पना के साथ असंयोज्य और असंगत है .
ये तो हम सभी जानते हैं कि भारत में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है और ऐसे में इस धारा को ख़त्म करने का निर्णय लेकर यहाँ यह अधिकार भी उस अवसादग्रस्त जनता को दे रहे हैं जो प्राण की समाप्ति को उतारू है .इंग्लैण्ड में आत्महत्या अधिनियम १९६१ पारित होते ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी करके सभी चिकित्सकों तथा सबंधित प्राधिकारियों को यह निर्देश दिया कि आत्महत्या को एक चिकित्सीय तथा सामाजिक समस्या माना जाना चाहिए और यही इस अपराध के प्रति सही कानूनी दृष्टिकोण है .आत्महत्या की ओर प्रवृत होने वाले व्यक्ति के प्रति सहानुभूति के दो शब्द तथा कुशल परामर्श की व्यवस्था होनी चाहिए न कि जेलर का पाषाणी व्यवहार या अभियोजक की सख्त कार्यवाही क्योंकि वास्तव में देखा जाये तो आत्महत्या ”सहायता के लिए पुकार है दंड के लिए नहीं ” इसलिए इस धारा के खात्मे की सोचना लोकेन्द्र सिंह …..में दिए गए उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार जनता को प्राण की अनैसर्गिक सम्पति का अधिकार देना है जो कि संविधान के अनुच्छेद २१ के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है जबकि वास्तव में इसमें दिए गए दंड की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है जो ऐसा कदम उठाने की सोचने वाले की सोच को मोड़कर सही दिशा दे सके इसलिए यदि वर्तमान केंद्र सरकार में पिछली सरकारों की अपेक्षा कुछ अद्भुत करने की महत्वाकांक्षा है , गुंजाईश है तो उसे इस धारा के दंड में बदलाव करते हुए अपराधी को सहानुभूति की दो शब्द व् कुशल चिकित्सकों की देख-रेख में रहकर मानसिक स्थिति सुधरने व् मजबूत करने का दंड देने की व्यवस्था करनी चाहिए .

[published in jagran junction on 14-12-2014]

imageview

शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]



Tags:     

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

4 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
December 15, 2014

शालनी जी मोदी सरकार किसको मार रही है जिस फैसले का आप जिक्र कर रहीं है वह तो हुप्रीम कोर्ट का फैसला है न की कैबिनेट का डॉ शोभा

rajanidurgesh के द्वारा
December 14, 2014

शालिनीजी बहुत अच्छा. सच में आत्मा किसी का हो अपना या दूसरे का . अगर दूसरे की आत्मा को मारने का प्रयास पर दंड का प्राबधान है तो फिर अपनी आत्मा को ख़त्म करने का प्रयास पर दंड क्यों नहीं?

deepak pande के द्वारा
December 13, 2014

Aise logo ki dasha ko samajh uska nirakaran karna chahiye

sadguruji के द्वारा
December 12, 2014

आदरणीया शालिनी कौशिक जी ! क़ानूनी दृष्टि से आपने सही लिखा है,परन्तु ऐसे लोग दंड नहीं बल्कि सहानुभूति के पात्र हैं ! उपयोगी रचना शेयर करने के लिए अतिशय आभार !


topic of the week



latest from jagran