! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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चिंता - चिता सम मानव की खातिर ,

Posted On: 25 Sep, 2014 social issues,कविता,Celebrity Writer में

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मिटा देती है जीवन का
समस्त अस्तित्व चिंताएं ,
ये आ जाती हरेक मन में
बिना हम सबके बुलाये ,
सुकून का कोई भी पल
ये हम पर रहने न देती ,
तड़पने की टीस भरकर
ये हमको तोहफे हैं देती ,
नहीं बच सकते हम इनसे
नहीं कर सकते इनको दूर ,
ये तोड़ें स्वाभिमान सबका
ये सबकी खुशियां करती दूर ,
कही जाती है ये चिंता
चिता सम मानव की खातिर ,
घिरा जैसे कोई इनसे
हुआ शमशान में हाज़िर .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
October 1, 2014

आदरणीया शालिनी जी,  चिंता-चिता पर सूक्ष्म जानकारी भरी कविता, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ |

yamunapathak के द्वारा
September 30, 2014

सही बात शालिनी जी और कहा भी जाता है दोनों शब्दों के बीच बस एक बिंदु का ही फर्क है. साभार

रमेश भाई आँजना के द्वारा
September 29, 2014

वाह,,बहुत खूब,, लाजवाब

Shobha के द्वारा
September 29, 2014

शालिनी जी अगर जीवन से चिंताए हट जाए जीवन कितना आसान हो जाये आधी बिमारी तो चिंता की दी हई हैं शोभा

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
September 29, 2014

चिता तो मरने पर जलाती है लेकिन चिंता ज़िंदा ही जलाकर भष्म कर देती हा ई / अच्छी कविता / बधाई /


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