! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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मेरे लहू में है ,

Posted On: 31 Aug, 2014 Others,कविता,Celebrity Writer में

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कहने की नहीं हसरत ,मेरे लहू में है ,
सहने की नहीं हिम्मत ,मेरे लहू में है ,
खंजर लिए खड़ा है ,मेरा ही भाई मुझ पर ,
जीने की नहीं उल्फत ,मेरे लहू में है .
………………………………………………………………………..
खाते थे रोटी संग-संग ,फाके भी संग किये थे ,
मुश्किल की हर घडी से ,हम साथ ही लड़े थे ,
अब वक़्त दूसरा है ,मक़सूम दिल हुआ है ,
मिलने की नहीं उल्फत ,मेरे लहू में है .
………………………………………………………..
सौंपी थी मैंने जिसके ,हाथों में रहनुमाई ,
अब आया वही बढ़कर ,है करने को तबाही ,
मुस्कान की जगह अब ,मुर्दादिली है छाई ,
हमले की न महारत ,मेरे लहू में है ,
………………………………………………..
वो पास खड़े होकर ,यूँ मारते हैं पत्थर ,
सिर पर नहीं ये चोटें ,आके लगे हैं दिल पर ,
इंसानियत के टुकड़े, वे बढ़के कर रहे हैं ,
झुकने की न मुरौवत ,मेरे लहू में है ,
……………………………………………………
बर्बाद कर रहे ये ,सदियों का भाईचारा ,
इनके लिए है केवल ,पैगाम ये हमारा ,
मिल्लत के दुश्मनों को , ”शालिनी ”क़त्ल कर दे ,
क़ुरबानी की ही चाहत ,मेरे लहू में है ,
………………………………………………………….
शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
September 2, 2014

आदरणीया शालिनी जी, मौजूदा दौर के हलकान-परेशान आदमीयत की दिली ख्वाहिश और उसका दबा हुआ गुस्सा इस नज़्म में उतर आया है – ”वो पास खड़े होकर ,यूँ मारते हैं पत्थर , सिर पर नहीं ये चोटें ,आके लगे हैं दिल पर , इंसानियत के टुकड़े, वे बढ़के कर रहे हैं , झुकने की न मुरौवत ,मेरे लहू में है ,” …हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

Udai Shankar Srivastava के द्वारा
September 2, 2014

बहुत ह्रदय स्पर्शी कविता . शुभकामनाएं . अगर समय मिले तो मेरी कविता “वतन वालों सुनो” पढियेगा .

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 2, 2014

शालिनी जी, मौजूदा परिवेश पर बहुत अच्छी कविता ।

Shobha के द्वारा
September 1, 2014

शालिनी जी अच्छी कविता पढने को मिली डॉ शोभा

pkdubey के द्वारा
September 1, 2014

समाज की आज की हक़ीक़त दर्शाती रचना आदरणीया .सादर आभार |


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