! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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बेटी को इस धरा पे ,क्यूँ जन्म है दिया ?

Posted On: 5 Aug, 2014 social issues,Celebrity Writer,Others में

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हे प्रभु तुमने

ये क्या किया

बेटी को इस धरा पे ,क्यूँ जन्म है दिया ?

तू कुछ नहीं कर सकती

कमज़ोर हूँ तेरे ही कारण

कोई बेटी ही

शायद

ये न सुने

अपने पिता से !

फिर जन्म दिया क्यूँ

बेटी को

हे प्रभु तुमने ?

बेटी को बना तुमने

दुःख दे दिए हज़ारों

बेटी ही है इस धरा पर

मारो कभी दुत्कारो

सामर्थ्य दिखाने की

यही राह क्यूँ चुनी

हे प्रभु तुमने ?

जब बैठे थे बनाने

हाथों से अपने बेटी

अपनों से भी लड़ने की

ताकत से मलते मिटटी

क्यूँ धैर्य ,सहनशीलता ,दुःख

ही भरे थे उसमें

हे प्रभु तुमने ?

…………………..

शालिनी कौशिक

[कौशल ]



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sumit के द्वारा
August 8, 2014

तारीफ़-ऐ-काबिल रचना

sadguruji के द्वारा
August 7, 2014

तू कुछ नहीं कर सकती कमज़ोर हूँ तेरे ही कारण कोई बेटी ही शायद ये न सुने अपने पिता से ! बहुत विचारणीय और भावपूर्ण रचना ! बहुत बहुत बधाई !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 6, 2014

उन लोगों पर अच्छा कटाक्ष है जो बेटी से दुर्व्यवहार करते हैं ,लेकिन ज़माना बदल रहा है ,आज कल ज्यादा तर लोग बेटी को बहुत प्यार करते हैं .ह्रदय स्पर्शी रचना .

Shobha के द्वारा
August 6, 2014

शालिनी जी बेटी बहूत अच्छी होती है कितनी भी दुख डर से माँ बाप पालें अपना पूरा फर्ज बड़ी वफादारी से निभाती हैं जीवन का अंत आता है बेटी ही माँ बाप के हर दर्द को सुनती है अभागे है जिनके बेटी नही है आपने बड़ी भाव पूर्ण कविता लिखी है शोभा

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 6, 2014

बेटी के दर्द को कविता मे पिरोने की अच्छी कोशिश है ।

KKumar Abhishek के द्वारा
August 6, 2014

बड़ी बहन शालिनी कौशिक जी, सादर नमन ! अक्सर अच्छी कविता पाठ के बाद ‘वाह’ निकलता है…लेकिन आपकी रचना पढ़ के ह्रदय से ‘आह’ निकला है….काश शर्महीनो और कर्महीनो को भी ऐसी कविताओं से पाला पड़े और हम ‘पुरुष’ के रूप में शर्मिंदा होने से बच सकें, धन्यवाद जी |


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