! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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झुका दूं शीश अपना ये बिना सोचे जिन चरणों में ,[पितृ दिवस पर विशेष]

Posted On: 15 Jun, 2014 कविता,Celebrity Writer,Special Days में

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झुका दूं शीश अपना ये बिना सोचे जिन चरणों में ,

ऐसे पावन चरण मेरे पिता के कहलाते हैं .

………………………………………………………………………..

बेटे-बेटियों में फर्क जो करते यहाँ ,

ऐसे कम अक्लों को वे आईना दिखलाते हैं .

…………………………………………………………………….

शिक्षा दिलाई हमें बढाया साथ दे आगे ,

मुसीबतों से हमें लड़ना सिखलाते हैं .

……………………………………………………………….

मिथ्या अभिमान से दूर रखकर हमें ,

सादगी सभ्यता का पाठ वे पढ़ाते हैं .

………………………………………………………………………..

कर्मवीरों की महत्ता जग में है चहुँ ओर,

सही काम करने में वे आगे बढ़ाते हैं .

……………………………………………………………………

जैसे पिता मिले मुझे ऐसे सभी को मिलें ,

अनायास दिल से ये शब्द निकल आते हैं .

………………………………

शालिनी कौशिक

[कौशल]



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
June 20, 2014

झुका दूं शीश अपना ये बिना सोचे जिन चरणों में , ऐसे पावन चरण मेरे पिता के कहलाते हैं . ……………………………………………………………………….. बेटे-बेटियों में फर्क जो करते यहाँ , ऐसे कम अक्लों को वे आईना दिखलाते हैं.बहुत सार्थक और शिक्षाप्रद रचना ! आपको बधाई !

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
June 15, 2014

सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति .बधाई

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 15, 2014

जैसे पिता मिले मुझे ऐसे सभी को मिलें , अनायास दिल से ये शब्द निकल आते हैं . ……………………………… शालिनी जी बहुत सुन्दर भाव ..हर पिता अपनी संतान को ऐसे सुअवसर संस्कार और संरक्षण दें ताकि आप जैसे ऐसे ही सब के मुख से शब्द निकलें ..आप को पितृ दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं पिता श्री को नमन भ्रमर ५

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
June 15, 2014

बेटे-बेटियों में फर्क जो करते यहाँ , ऐसे कम अक्लों को वे आईना दिखलाते हैं,बहुत सुंदर भावनात्मक एवं स्वभाविक अभिव्यक्ति .

Ravindra K Kapoor के द्वारा
June 15, 2014

सुन्दर रचना माता पिता का महत्व कुछ होता ही ऐसा है जिसे शब्दों में पिरोना बहुत ही कठिन है. सुभकामनाओं के साथ…रवीन्द्र के kapoor

Udai Shankar Srivastava के द्वारा
June 15, 2014

बहुत अच्छी और मन छूने वाली कविता , साधुवाद

Shobha के द्वारा
June 15, 2014

शालिनी जी आपने आपने बहुत सुन्दर भाव पूर्ण कविता लिखी है |आपने फादर डे पर मैने लेख लिखा था उस में एक प्रश्न उठाया था क्या हमारे यहां लडकिया पैर छूती हैं शालिनी जी मेरे दिमाग में सदा रहा है लड़के लड़की में कोई फर्क नहीं है बेटी भी अपने माता पिता के पैर छूसकती है भगवान ने मुझे ऐसी बेटी दी है या उसको इस तरह से अधिकार दिया जिसको जन्म दे कर मैं धन्य हो गई हम दोनों की इच्छा है हम जब दुनिया से जाएँ मेरी बेटी भी हमें कंधा दे मेरी बेटी के बाद परिवार में जिसके भी यदि एक ही लड़की है या दो हैं लड़का नही है किसी को कोई अफ़सोस नहीं है घर की बेटियांपरिवार में बड़ों के सम्मान में पैर छूती हैं हम अपनी बच्चियों को बहुत प्यार दुलार से पालते हैं में सोचती हूँ यही स्वस्थ सोच समांज में अब हो जानी चाहिए डॉ शोभा भरद्वाज

    June 15, 2014

    shobha ji aaj is desh ko samaj ko aap jaisee soch ke logon kee hi aavshyakta hai .main aapki soch se poori tarah se सहमत हूँ .यहाँ आकर मेरा उत्साहवर्धन करने हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद .


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