! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

667 Posts

2139 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12172 postid : 751834

हिन्दू-मुस्लिम भेद-समझ-समझ का फेर

Posted On: 9 Jun, 2014 Others,social issues,Celebrity Writer में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

एक सार्वभौमिक सत्य के बारे में आप सभी जानते ही होंगें कि दूध गाय -भैंस ही देती हैं और जहाँ तक हैं इनका कोई धर्म जाति नहीं होती ,इनमे आपस में होती हो तो पता नहीं किन्तु जहाँ तक इंसान की बात है वह इस सम्बन्ध में  कम से कम मेरी जानकारी के अनुसार तो अनभिज्ञ ही कहा जायेगा .

पर आज मेरी यह जानकारी धरी की धरी रह गयी जब मैंने अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी जी को पड़ोस की ही दूसरी आंटी जी से बात करते सुना ,वे उनसे दूध के बारे में पूछ रही थी और ये  बता रही थी कि उन्हें अपने यहाँ के एक धार्मिक समारोह के लिए ज्यादा दूध की आवश्यकता है। दूसरी आंटी  के ये कहने पर कि उनका दूधवाला बहुत अच्छा दूध लाता है पर वे फटाक से बोली लाता तो हमारा दूधवाला भी बहुत बढ़िया दूध है पर वह मुसलमान है ना ,………………………………………………आश्चर्य से हक्की-बक्की रह गयी मैं उनकी इस बात पर कि वे दूधवाले के मजहब से दूध-दूध में भेद कर रही हैं जबकि उन्हें दूध चाहिए था जो या तो गाय देती है या भैंस ,आज तक दूध के मामले में गाय-भैंस का अंतर तो सुना था पर हिन्दू-मुसलमान का अंतर कभी नहीं, मन में विचार आया कि फिर क्या वे अपने यहाँ बनने वाले भोजन में भी हिन्दू-मुसलमान  का भेद करेंगी  जिसका ये पता नहीं कि वह हिन्दू के खेत की पैदावार है या मुसलमान के खेत की।

ये सोच-समझ का अंतर केवल इन्ही की सोच-समझ का ही नहीं है अपितु आमतौर पर देखने में मिलता है ;जैसे हिन्दू अपने यहाँ मिस्त्री का काम मुसलमान मिस्त्री से भी करा लेते हैं किन्तु मुसलमान अपने घर पर हिन्दू मिस्त्री नहीं लगाते ,जैसे मुसलमान हिन्दू की थाली में बिना भेद किये खा लेते हैं जबकि हिन्दू मुसलमान की थाली इस्तेमाल करते हिचकिचाते हैं।

हिन्दू मुसलमान का यह वैचारिक मतभेद मिटना मुश्किल है क्योंकि मुसलमान यहाँ अपने को असुरक्षित महसूस करते हैं और हिन्दू इनकी जीवनचर्या को अपने सिद्धांतों के विपरीत और ये सोच का अन्धकार शिक्षा का उजाला भी दूर करने में अक्षम है और यही देश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हमारे नेताओं को मौका देता है जिसे इन नेताओं के हाथ से छीनना इन सोच-समझ की परिस्थितियों में नामुमकिन नहीं तो कठिन अवश्य है और इस मुश्किल को केवल आपसी समझ-बूझ से ही ख़त्म किया जा सकता है। जब गाय को मुसलमान के पास रहकर अपना पालन-पोषण कराने व् दूध देने में आपत्ति नहीं तो हम गाय-भैंस की वजह से हिन्दू-मुसलमान का अंतर क्यूँ कर रहे हैं और यही समझ-बूझ हमें विकसित करनी होगी जैसे कि आपने भी पढ़ा-सुना होगा ठीक ऐसे ही -

”खुदा किसी का राम किसी का ,

बाँट न इनको पाले में।

तू मस्जिद में पूजा कर ,

मैं सिज़दा करूँ शिवाले में।

जिस धारा में प्यार-मुहब्बत ,

वह धारा ही गंगा है।

और अन्यथा क्या अंतर ,

वह यहाँ गिरी या नाले मे। ”

शालिनी कौशिक

[कौशल ]



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

7 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
May 19, 2015

शोभा जी अलग-अलग धर्म अलग-अलग विचारधारा को मानते है / धार्मिक एकता की बात केवल हिन्दू ही करते है / बाकी धर्मो में धर्मपरिवर्तन का प्रावधान है जो इस बात बात का प्रमाण है की उनका धर्म बाकी धर्मों से श्रेष्ठ है / अब आप ही बताइये ” वसुधैव कटुम्बकम” और ” दारुल हरब -दारुल इस्लाम ” के अलग -अलग विचारधारा वाले धर्म एक सन्देश कैसे देते है /

Shobha के द्वारा
May 19, 2015

प्रिय शालिनी जी सब यहीं के हैं बस फर्क बस धर्म का है धार्मिक पुस्तक का हैं हर धर्म अच्छी बात करते हैं अच्छे विचार डॉ शोभा

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
June 10, 2014

शालिनी जी -बिलकुल सही लिखा है आपने .

वाह रे इंसान अपनी धर्मान्धता में आपस में लड़कर अपनों का खून तो बहाया ही साथ ही पशुओ के ढूध को भी बाँट दिया हद है…फर्क बस सोच और नजरिये का है वरना रामप्रसाद और खुदाबक्श में फर्क क्या है..यू तो दिवाली में भी अली है और रामदान में राम…बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति..सादर..

dhirchauhan72 के द्वारा
June 9, 2014

महोदया जी ,…..कृपा करके कुछ ऐसे देशों के नाम बता दीजिये जहां मुसलमान सुरक्षित महसूस करते हों ….?श्री मान जे एल सिंह की भी प्रतिक्रिया पढ़ कर ऐसा लगा की हिन्दू बहुसंख्यक हो कर भी इन पर विश्वास नहीं कर पा रहा है ? एक दो अमीर देश जैसे सऊदी अरेबिया में भारत और अन्य देशों से गरीब मुस्लिम अपने देशों में भेड़ें चरवाने का काम करवाते हैं मेरे जानकारी यहां तक है की बाकायदा बंधुआ मजदूर बनाया जाता है इतनी अमीरी होने केबाद भी खाने तक को ठीक से नहीं दिया जाता ! अर्थात ये कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं कई जगह मुसलामानों के हुलिये जैसे दिखने के कारण सरदारों को भी निशाना बनना पड़ रहा है वो भी पश्चिमी देशों में ….? आप का विश्लेषण बेहद घटिया है हिंदू कभी भी धर्म के आधार पर फर्क नहीं करता……. रही बात छुआ छूत की तो ऐसा तो मेरे घर में भी है मेरी बीबी शाकाहारी है और मैं व मेरे बच्चे मांसाहारी और अक्सर वो मेरा और बच्चों का छुआ खाना और पानी नहीं पीती………मैं मानता हूँ ये ढकोसला है लेकिन मैं उसकी मान्यताओं को क्यों ठेस पहुंचाऊं….? …….लेकिन इसे साम्प्रदायिकता नहीं समझा जा सकता ! किसी मूर्खता भरी सोच को मुसलमानों के साथ जोड़ कर देखने मात्र से कोई आदमी समझदार और लेखक नहीं हो जाता ! ऐसा करके आप सामाजिक गन्दगी या अपने मन में भरी गन्दी सोच को तुष्ट कर रहे हैं ………धन्यवाद

    June 10, 2014

    धीरचौहान जी आपकी टिप्पणी से ये साफ तौर पर ज़ाहिर है कि आप एक निराश व्यक्तित्व के मालिक हैं और इसीलिए किसी भी लेख का गलत मतलब निकालते हैं और मेरी सोच घटिया है या मैं लेखक नहीं हूँ इसके लिए मैंने आपसे प्रमाणपत्र नहीं माँगा आपके लिए कोई ज़बरदस्ती नहीं है कि आप यहाँ टिप्पणी करें .मुझे आपके विचार सही नहीं लगते तो मैं कौन उन्हें घटिया कहने के लिए आपके ब्लॉग पर जाती हूँ .आप पहले किसी मनोचिकित्सक से मिलें और अपना सही तरह इलाज़ कराएं .मेरे विचार आप जैसे निराशावादी या फिर यूँ कहें कि विभाजनवादी मानसिकता वाले लोग नहीं पलट सकते .आभार

jlsingh के द्वारा
June 9, 2014

आदरणीया, आपका आलेख पढने के बाद मैंने अपने कुछ हिंदू मित्रों से बात की- सभी इसी मत से सहमत थे, जिसे आपने उठाया है. जो शुद्ध शाकाहारी नहीं हैं, वे मुसलमान से .मीट – मुर्गा तो ले सकते हैं, उसके साथ बैठकर दारू भी पी सकते हैं, पर पूजा के लिए दूध तो छोड़िये,..सामान्य दूध भी नहीं ले सकते क्योंकि मुसलमान पर बिश्वास नहीं किया जा सकता…क्या पता दूध में क्या मिला दे? वे लोग तो चाहते ही हैं कि हमारे धर्म को भ्रष्ट कर दें … बस…देखते हैं, यहाँ और क्या विचार आते हैं?


topic of the week



latest from jagran