! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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बाँटो ''शालिनी''के संग रोज़ गम ख़ुशी माँ के,

Posted On: 10 May, 2014 कविता,Celebrity Writer,Special Days में

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Mother : illustration of mother embracing child in Mother s Day Card Stock Photo


तरक्की इस जहाँ में है तमाशे खूब करवाती ,

मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .

………………………………………………………………….
महीनों गर्भ में रखती ,जनम दे करती रखवाली ,

उसे औलाद के हाथों है कुछ सौगात दिलवाती .

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सिरहाने बैठ माँ के एक पल भी दे नहीं सकते ,

दिखावे में उन्हीं से होटलों में मंच सजवाती .

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कहे माँ लाने को ऐनक ,नहीं दिखता बिना उसके ,

कुबेरों के खजाने में ठन-गोपाल बजवाती .

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बढ़ाये आगे जीवन में दिलाती कामयाबी है ,

उसी मैय्या को औलादें, हैं रोटी को भी तरसाती .

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महज एक दिन की चांदनी ,न चाहत है किसी माँ की ,

मुबारक उसका हर पल तब ,दिखे औलाद मुस्काती .

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याद करना ढूंढकर दिन ,सभ्यता नहीं हमारी है ,

हमारी मर्यादा ही रोज़ माँ के पैर पुजवाती .

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किया जाता याद उनको जिन्हें हम भूल जाते हैं ,

है धड़कन माँ ही जब अपनी कहाँ है उसकी सुध जाती .

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वजूद माँ से है अपना ,शरीर क्या बिना उसके ,

उसी की सांसों की ज्वाला हमारा जीवन चलवाती .

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शब्दों में नहीं बंधती ,भावों में नहीं बहती ,

कड़क चट्टान की मानिंद हौसले हममे भर जाती .

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करे कुर्बान खुद को माँ,सदा औलाद की खातिर ,

क्या चौबीस घंटे में एक पल भी माँ है भारी पड़ जाती .

…………………………………………………………………….

मनाओ इस दिवस को तुम उमंग उत्साह से भरकर ,

बाद इसके किसी भी दिन क्या माँ है याद फिर आती .

…………………………………………………………………..
बाँटो ”शालिनी”के संग रोज़ गम ख़ुशी माँ के,

फिर ऐसे पाखंडों को ढोने की नौबत नहीं आती .


शालिनी कौशिक

[कौशल]





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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
May 12, 2014

समाज की आज की हक़ीक़त बयां करती रचना.सादर बधाई मैडम जी.

Sushma Gupta के द्वारा
May 11, 2014

शालिनी जी, माँ के लिए आपकी भावनात्मक प्रस्तुति सुन्दर व् वेजोड़ है.. .बहुत वधाई..

Imam Hussain Quadri के द्वारा
May 11, 2014

बहुत ही प्यारा है बहुत खूब लिखा आपने इसी लिए तो कहा गया है के माँ के चरणों में सवर्ग है .

सार्थक प्रस्तुति..


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