! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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..... समझ न पायेंगें .

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ज़ुदा-ज़ुदा से हुए फिर रहे थे आज तलक

मेहरबाँ हो गए कैसे समझ न पायेंगें ,

भरोसा करके यूँ बैठे हमारी सूरत का

ज़माने में कभी भी हम समझ न पायेंगें .

………………………………………………….

हमारे चेहरे से नफरत तुम्हें थी आज तलक

करीब क्यूँ हुए इतने समझ न पायेंगें ,

हमारे बोल लबों पर सजाये फिरते हो

हुए हो हम पे नरम क्यूँ  समझ न पायेंगें .

……………………………………………….

मिली हमें है जो मंज़िल तुम्हारी चाहत थी

हो तब भी ऐसे में खुश तुम समझ न पायेंगें .

सहारे के सभी ज़रिये तुम्हारे छीने हैं

बने क्यूँ फिर रहे मेरे समझ न पायेंगें .

………………………………………….

फरेबी कहते थे मुझको दबी ज़ुबान से तुम

क्यूँ कर रहे वाह-वाह समझ न पाएंगे ,

खफा थे सामने भी तुम खफा थे पीछे भी

बदले क्यूँ ख़यालात समझ न पायेंगें .

……………………………………………….

सियासत ने यूँ बदले हैं तुम्हारे हाव-भाव सारे

क्यूँ काटें बदले फूलों में समझ न पायेंगें ,

खोले इस कदर परतें तुम्हारी खुल के ‘शालिनी ‘

इसे हम अब यहाँ कैसे समझ न पाएंगे .

…………………………………………….


शालिनी कौशिक

[कौशल ]



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 21, 2014

बड़ी सुन्दर कविता के भाव हैं मुस्लिम अपने खुद के नेताओ के शिकार है उनको डराया हैं अपना फायदा किया हैं इस बात का भी ध्यान रखिये shobha

Dr.Swastik Jain के द्वारा
April 20, 2014

वाह बहुत सुन्दर…!!

Udai Shankar Srivastava के द्वारा
April 19, 2014

आप के लेखन में विविधता है | बहुत अच्छी कविता |


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