! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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हुकुम देना है हक़ इनका ,हुकुम सुनना हमारा फ़र्ज़ ,

Posted On: 28 Mar, 2014 social issues,कविता,Celebrity Writer में

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बहाने खुद बनाते हैं,हमें खामोश रखते हैं ,

बहाना बन नहीं पाये ,अकड़कर बात करते हैं .

……………………………………………….

हुकुम देना है हक़ इनका ,हुकुम सुनना हमारा फ़र्ज़ ,

हुकुम मनवाने की ताकत ,पैर में साथ रखते हैं .

………………………………………………………

मेहरबानी होती इनकी .मिले दो रोटी खाने को ,

मगर बदले में औरत के ,लहू से पेट भरते हैं .

………………………………………………………

महज़ इज़ज़त है मर्दों की ,महज़ मर्दों में खुद्दारी ,

साँस तक औरत की अपने ,हाथ में बंद रखते हैं .

…………………………………………………

पूछकर पढ़ती-लिखती हैं ,पूछकर आती-जाती हैं ,

इधर ये मर्द बिन पूछे ,इन्हीं पर शासन करते हैं .

………………………………………………..

इशारा भी अगर कर दें ,कदम पीछे हटें उसके ,

खिलाफत खुलकर होने पर ,भी अपनी चाल चलते हैं .

………………………………………………………….

नहीं हम कर सकते हैं कुछ भी ,टूटकर कहती ”शालिनी ”

बनाकर  जज़बाती हमको ,ये हम पर राज़ करते हैं .


..

शालिनी कौशिक

[WOMAN ABOUT MAN]




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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ADVOCATE VISHAL PANDIT के द्वारा
March 29, 2014

बहुत ही सुंदर पंक्तिया ……… ख़ूबसूरत लेख.

sadguruji के द्वारा
March 29, 2014

आदरणीया शालिनी कौशिकजी,समाज में स्त्री की दुर्दशा और पुरुष की शासन करने वाली मानसिकता की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति-नहीं हम कर सकते हैं कुछ भी ,टूटकर कहती ”शालिनी ” बनाकर जज़बाती हमको ,ये हम पर राज़ करते हैं.इस रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

jlsingh के द्वारा
March 29, 2014

नहीं हम कर सकते हैं कुछ भी ,टूटकर कहती ”शालिनी ” बनाकर जज़बाती हमको ,ये हम पर राज़ करते हैं . समय थोडा तो बदला है अभी कुछ और बदलेगा खता को माफ़ कर देना कभी ये आज कहते हैं. सादर आदरणीया परिवर्तन अवश्यम्भावी है


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