! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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महबूबा यहाँ सबकी बस कुर्सी सियासत की ,

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फुरसत में तुम्हारा ही दीदार करते हैं ,

खुद से भी ज्यादा तुमको हम प्यार करते हैं।

…………………………..

अपनों से ज़ुदा होने की फ़िक्र है नहीं ,

तुम पर ही जान अपनी निसार करते हैं।

………………………………..

झुकती हमारी गर्दन तेरे ही दर पे आकर ,

हम तेरे आगे सिज़दा बार -बार करते हैं।

…………………………..

ये ज़िंदगी है कितनी हमको खबर नहीं है ,

पलकें बिछाके फिर भी इंतज़ार करते हैं।

…………………………………………

बालों में है सफेदी ,न मुंह में दाँत कोई ,

खुद को तेरी कशिश में तैयार करते हैं।

……………………………………….

महबूबा यहाँ सबकी बस कुर्सी सियासत की ,

पाने को धक्का -मुक्की और वार करते हैं।

……………………………………….

”शालिनी ”देखती है देखे अवाम सारी ,

बहरूपिये बन -ठन कर इज़हार करते हैं।

…………………………………

शालिनी कौशिक

[कौशल ]



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
March 28, 2014

वाह शालिनी जी ,बहुत ही सुन्दर जज्वातों में इस सियासत के खेल में आपने अपनी बात व्यक्त कर दी है …आपकी सशक्त लेखनी ने सब सही वयां किय़ा है ..


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