! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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.............सियासत के काफिले .

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हमको बुला रहे हैं सियासत के काफिले ,
सबको लुभा रहे हैं सियासत के काफिले .
……………………………………………..
तशरीफ़ आवरी है घडी इंतखाब की,
दिल को भुना रहे हैं सियासत के काफिले .
……………………………………………..
तसलीम कर रहे हैं हमें आज संभलकर ,
दुम को दबा रहे हैं सियासत के काफिले .
…………………………………………..
न देते हैं मदद जो हमें फ़ाकाकशी में ,
घर को लुटा रहे हैं सियासत के काफिले .
……………………………………………..
मख़मूर हुए फिरते हैं सत्ता में बैठकर ,
मुंह को धुला रहे हैं सियासत के काफिले .
………………………………………………..
करते रहे फरेब हैं जो हमसे शबो-रोज़ ,
उनको छुपा रहे हैं सियासत के काफिले .
………………………………………………
फ़ह्माइश देती ”शालिनी” अवाम समझ ले ,
तुमको घुमा रहे हैं सियासत के काफिले .
……………………………………………
शालिनी कौशिक
[कौशल ]

शब्दार्थ-तशरीफ़ आवरी-पधारना ,इंतखाब-चुनाव ,फाकाकशी-भूखो मरना ,मखमूर-नशे में चूर



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
March 28, 2014

“मख़मूर हुए फिरते हैं सत्ता में बैठकर” आदरणीया शालिनी जी, सुंदर प्रस्तुति!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 27, 2014

समसामयिक प्रस्तुति के लिए शालिनी जी बधाई !

Ritu Gupta के द्वारा
March 27, 2014

सुंदर व् सच्चाई को बयान करती अच्छी गजल बधाई शालिनी जी


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