! मेरी अभिव्यक्ति !

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भाजपा सर्वाधिक लोकतान्त्रिक-कॉंग्रेस की तारीफ क्यूँ ?

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नरेंद्र मोदी ने कहा, “उनके लिए लोकतंत्र का सीमित अर्थ है और वो है चुनाव के जरिया सत्ता तक पहुंचना। बाकी किसी प्रकार से कांग्रेस के जीवन में लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र के चार दुश्मन – वंशवाद-परिवारवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, अवसरवाद। कांग्रेस में ये चारों चीजें हैं।”
नरेंद्र मोदी जी का उक्त विश्लेषण ये तो स्पष्ट करता ही है कि उन्हें बहुत शीघ्र राजनीति में डॉक्ट्रेट की उपाधि मिलने वाली है किन्तु ये उपाधि उन्हें उनकी पार्टी से धक्के मारकर निकालने के बाद ही दी जायेगी क्योंकि उनका सारा ध्यान एकमात्र कॉंग्रेस पर ही लगा है और इस सारी लीपापोती में वे ये नहीं देख पा रहे हैं कि जो गुण वे कॉंग्रेस में बता रहे हैं वे आज लगभग सभी पार्टियों में रच बस गए हैं .
वे कहते हैं कि लोकतंत्र के चार दुश्मन -जिसमे सबसे पहले वंशवाद -परिवारवाद-क्या केवल कॉंग्रेस में जबकि सपा के नेताजी के चश्मो चिराग अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं ,भाजपा में विजयराजे सिंधिया की सुपुत्री वसुंधरा राजे सिंधिया राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं ,राजनाथ सिंह जो इस वक्त भाजपा के अध्यक्ष हैं उनके सुपुत्र पंकज सिंह राजनीति में क्या ढोल बजाने के लिए आये हैं क्या ये वंशवाद नहीं ?इससे अगर बची है तो केवल बसपा और वह भी इसलिए क्योंकि उसकी प्रमुख मायावती जी का कोई वंश ही नहीं .
जातिवाद आज हर दल की सत्ता में पहुँचने की सीढ़ी है और सपा यादव को लेकर ,बसपा दलितों को लेकर व् भाजपा बनियों -ब्राह्मणों को लेकर जब तब अपना वोट बैंक सुदृढ़ करने में व्यस्त हैं फिर अकेली कॉंग्रेस की तारीफ क्यों ?
सम्प्रदायवाद -ये तमगा मोदी किसी और के गले में कैसे डाल सकते हैं जबकि जिस पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनकर अपने बैंड मोदी बजवा रहे हैं वह पार्टी इस परंपरा की शुरुआत करने वाली है .भाजपा ही वह दल है जिसने रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद का मुद्दा सत्ता में आने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और फिर सपा को भी एक हथियार अपनी तरफ से तोहफे के रूप में दे दिया मुसलमानों को एक रहनुमा के रूप में .ये भाजपा की ही करनी है जो आज मुसलमानों में डर कायम कर रही है और उन्हें सुरक्षा की दीवार सपा के रूप में दिखायी दे रही है फिर क्यों वे अपनी मेहनत का श्रेय दूसरों को दे रहे हैं ?
और रही अवसरवाद की बात तो बेकार की बात है इसका मुकुट मात्र कॉंग्रेस के सर सजाना क्योंकि अवसर मिला तो मोदी ने अडवाणी जी से वेटिंग का पद भी झटक लिया ,अवसर मिला तो अखिलेश ने नेताजी को राज्य से बाहर पटक दिया अवसर मिला तो मायावती ने कभी सपा तो कभी भाजपा को सत्ता से बाहर लटका दिया तो फिर कॉंग्रेस ही क्यों सभी दल इस सम्मान के लायक हैं किन्तु बस एक वाद है जो सबसे ज्यादा भाजपा में है और जिसके कारण यहाँ लोकतंत्र सर्वाधिक प्रभाव में है और वह है” विवाद ”और इसी कारण सर्वाधिक प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार यहीं हैं और यही कारण है कि यह पार्टी सर्वाधिक लोकतान्त्रिक पार्टी कही जा सकती है क्योंकि हमारे लोकतंत्र में यही तो एक महान गुण है जिसके कारण हम सही गलत का भेद नहीं कर पाते और जैसे भी हो अपने वर्चस्व के कायम करने में ही लगे रहते हैं भले ही इसके लिए हमारा घर बिक जाये देश टूट जाये .इसलिए भाजपा के ये महानुभाव निश्चित रूप में अपनी पार्टी की सही पहचान न करने के कारण निंदा के अधिकारी हैं क्योंकि बाहर दूसरों पर पत्थर फैंकने से पहले उन्हें अपने शीशे के घर को तो देखना ही होगा .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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6 प्रतिक्रिया

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February 20, 2014

हा..हा..हा..शालिनी जी, आप बड़ी शालीनता से यह सिद्ध करना चाहती हैं कि कांग्रेस में जो “गुण” हैं, वे कम या अधिक मात्रा में सभी पार्टियों में हैं, इसलिए हमें कांग्रेस का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है। वाह ! आप वकील हैं। यह बताईये कि क्या यह दलील न्यायालय में चल सकती है? नहीं न ! अगर भाजपा के एक नेता ने १ लाख कि रिश्वत ली और वे पकड़े गये तो आपके अनुसार कांग्रेस को करोड़ों-अरबों-खरबों के घोटाले करने का अधिकार मिल जाता है और भाजपा को उस पर उंगली उठाने का कोई अधिकार नहीं है। आपकी सारी दलीलें खोखली हैं। कांग्रेस इन सारे अवगुणों की खान है, जबकि दूसरी पार्टियों में ये अवगुण कम मात्रा में हैं। इसलिए कुतर्क छोड़कर तार्किक बात कीजिये।

    February 22, 2014

    chaliye aapne ye to mana ki aur partiyan bhi ye gun rakhti hain aapke modi sahab to apne shodh me iska jikr tak nahi karte .main कुतर्क करूँ या तर्क पर आप उनकी मदद ज़रूर कीजियेगा .आभार

dhirchauhan72 के द्वारा
February 19, 2014

भाजपा या मोदी कोंग्रेश को वंश वादी पार्टी बताते हैं तो मुझे भी दुःख होता है क्योंकि वंश क्या होता है ये अगर एक भारतवासी न समझे तो बेकार है और गांधी परिवार जिसे वंश कहा जाये तो मूर्खता ही है !…………….गांधी वंश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जिसने अपना उपनाम (नेहरू) तक बेटी को देना उचित नहीं समझा ……….और दूसरी प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी जिसने अपनी विधवा बहु को घर से निकाल दिया क्योंकि वो एक हिन्दू थी ………….और तीसरे प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की किसी बेटी तथा हिन्दू और मुस्लिम जो की उनके विरासत के साथ जुड़े थे उनसे रिश्ता नहीं रखा और ईसाई धर्म कबूल किया फिर एक विदेशी से शादी की ………….इसके बाद भी आप ये भी देखिये प्रियंका को भी राजनीति से बाहर करने में देर नहीं लगाईं क्योंकि उसने एक देशी भले ही ईसाई है से शादी की ………..लेकिन गांधी क्यों चिपका रखा है ये मुझे समझ नहीं आता ! गांधी आज इनके लिए भारत के नोटों के ऊपर छपी प्रतिमा की तरह है जिसे इन्होने अपने ऊपर भी छाप रखा है मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ जिस दिन प्रियंका वाड्रा कोंग्रेश को सँभालने का जिम्मा लेंगी इनका नाम भी प्रियंका गांधी होगा वाड्रा ख़त्म हो जाएगा ! इनके खानदान का कौन वारिस बनेगा ये भी तय करने का अधिकार पता नहीं किसके पास है किसका क्या नाम रखा जाएगा और क्या बताया जाएगा ये अधिकार भी इनके पास नहीं है और लोग इन्हें वंशवादी कहें तो दुःख होता है ! मेरी समझ ये कहती है ये अधिकार जरुर देश से कंट्रोल नहीं होते और ये सिर्फ जो काला धन विदेशों में जमा है सिर्फ उसी की देख रेख के लिए मजबूरी में देश की सत्ता में आते है जिसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं ये जरूर एक राज है जिसको किसी ताकतवर संस्था या देश का समर्थन हासिल है समय इस राज से पर्दा जरुर उठाएगा लेकिन तब तक हमें करना भी क्या ये आपस की बात है अर्थात वंशवादी का आरोप पूर्णतया गलत है बाकी सब सही है !

    February 22, 2014

    bharat me koi pita apni putri ko apna upnam uski shadi ke bad dahej me nahi deta …..aur vidhwa putrvadhu jab menka gandhi jai hon to samanya tarah se bat nahi kee jani chahiye aur yadi samanya bat kar hi rahe hain to indira ji bhi ek saas thi aur putrvadhu jo ki indian थी वह घर में साथ रहने लायक थी या नहीं ये वे ही बता सकती थी पर हर कोई अपने घर के मसले बाहर उछालता नहीं फिरता मेनका गांधी जी की तरह .

Pankaj Kumar Mishra Vatsyayan के द्वारा
February 19, 2014

यहाँ मैं आपसे थोडा मत भिन्नता युक्त हूँ। पार्टी कोई भी लोकततंत्रिक है या वंशवादी, इसका निर्धारण उसकी कार्य पद्धति से होता है। यहाँ बीजेपी ही एक मात्र लोकतान्त्रिक पार्टी है, क्यूंकी इसी पार्टी में शीर्ष नेतृत्व का चयन कार्यकर्ताओं के अनुरूप होता है। जिसका साफ़ उदहारण है- नरेंद्र मोदी को पी एम् उम्मीदवार बनाना। वर्ना एल के आडवाणी सा वरिष्ठ नेता पी एम् इन वैटिंग था। रही बात नेता पुत्रों की तो- ये तो कैरियर बनानें की बात है, जो चाहे राजनीती को अपना कैरियर बना ले। गड़बड़ तो तब होती जब की राहुल गांधी की तरह पंकज सिंह अपने पापा की सीट से लड़ते, माननीय वसुंधरा राजे अपनी मम्मी, जो अब दुनिया में नहीं रहीं उनकी पिछलग्गू नेता रही होतीं। कोई बी एस पी सुप्रीमो थोड़े ही है बी जे पी में ? बीजेपी में तो नेता होते हैं ना ? एक और बात नेता पुत्रों का राजनीती में आना, इसे हम लोग ही रोक सकते हैं, इस बार चुनाव में गांधी-वंशवाद को धुल चटाकर। शेष फिर kabhee………..


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