! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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डर गयी है यू.पी.ए.सरकार

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नरेंद्र मोदी की मेरठ रैली भले ही सफल हुई या असफल ये सवाल कि आखिर इस रैली से मोदी सफल हुए या नहीं और साफ़ उत्तर ये है कि मोदी कछुए की चाल से चलकर अपनी चाल में सफल हो गए हैं .मोदी अपना खौफ वर्त्तमान केंद्र सरकार के दिलोदिमाग में उतारने में कामयाब हो गए हैं और इसी का असर ये है कि मोदी की मेरठ रैली के समाचार से दूरदर्शन को पूरी तरह से अलग रखा गया .कहने को दूरदर्शन प्रसार भारती के अंतर्गत कार्य करता है और प्रसार भारती एक स्वायत्त संस्था है किन्तु वास्तव में यह वर्त्तमान सरकार के निर्देश के अंतर्गत ही कार्य करती है और ये बात पहली बार सामने नहीं आयी है वरन पहले भी ऐसा होता रहा है .२००४ से पहले एन.डी.ए.की सरकार भी यही करती रही वह भी सोनिया गांधी से सम्बंधित समाचारों को दूरदर्शन पर आने से रोकती रही और अब ये सरकार भी यही कर रही है सवाल ये उठता है कि यह देश जब अपने महापुरुषों को याद करने का उनके जन्म -शताब्दी समारोह मनाने का कार्य करता है तो मात्र दिखावे के तौर पर क्यूँ करता है ,क्यूँ वह ऐसा कर एहसान करता है उनकी आत्मा पर जो इस देश के भावनाओं के अनुसार ऐसे अवसरों पर हम सबके आस पास ही उपस्थित होती है .एक प्रसंग ऐसे अवसर पर मुझे अवश्य याद आता है जो कि स्वामी विवेकानंद से जुड़ा हुआ है .विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था उनसे उनके गुरु ने एक लकीर खींचकर उसे बिना मिटाये छोटी करने के लिए कहा और नरेंद्र ने उससे बड़ी लकीर खींच डी और इस तरह बिना मिटाये उस लकीर को छोटा कर दिया कहने का मतलब ये है कि ये नकारात्मक उपाय करने के स्थान पर यदि यू.पी.ए.सरकार अपनी कार्यप्रणाली में सुधार लाये तो उसे इस तरह के प्रसारण रोकने में माथापच्ची नहीं करनी होगी क्योंकि इस तरह के कामों में अपने दिमाग को लगाना मात्र नकारात्मक सोच का परिणाम है और कभी भी कोई संग्राम ऐसी सोच से नहीं जीते जाते जीतने के लिए जो सोच चाहिए वह ये होनी चाहिए -
”खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुद बन्दे से खुद पूछे
बता तेरी रज़ा क्या है .”
और नरेंद्र मोदी हो या भाजपा का कोई भी नेता वह केवल बन्दर घुड़की ही दे सकते हैं कर कुछ नहीं सकते ये तो उनकी मेरठ रैली की असफलता ने साबित ही कर दिया है .पहले वे दिल्ली में फेल हुए और अब मेरठ में भी .मुज़फ्फरनगर दंगों पर जो नेता अपना मुंह भी न खोले और इस में अपने जीवन के अमूल्य समय को स्वाहा करने वाले सुरेश राणा और ठाकुर संगीत सोम जैसे नेता को मंच से जो पार्टी बोलने तक का मौका न दे उसकी राजनीतिक नीयत का अंदाज़ा स्वतः ही लगाया जा सकता है इसलिए ऐसे इनका प्रसारण रोककर वह अपने पर ऊँगली न ही उठवाये तो उसके लिए भी बेहतर है और जनता के लिए भी क्योंकि फिर उसे सच्चाई जानने के लिए उन समाचार पत्रों का सहारा न लेना होगा जो पहले ही इस नेता को बिक चुके हैं और इस पार्टी के साथ अपना आर्थिक हित साधने का सपना देख चुके हैं .
शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
February 7, 2014

ेद solah aane sach kaha hai aapne aadarniya shalini ji

yatindranathchaturvedi के द्वारा
February 7, 2014

उल्लेखनीय, सादर

Imam Hussain Quadri के द्वारा
February 7, 2014

बिलकुल सही कह रही हैं आप काफी दिनों से मैं कुछ लिख नहीं प् रहा हूँ आज आया और आपकीये राय देखा अच्छा लिखा आपने .

SHILPA BHARTIYA के द्वारा
February 6, 2014

“सवाल ये उठता है कि यह देश जब अपने महापुरुषों को याद करने का उनके जन्म -शताब्दी समारोह मनाने का कार्य करता है तो मात्र दिखावे के तौर पर क्यूँ करता है ,क्यूँ वह ऐसा कर एहसान करता है उनकी आत्मा पर जो इस देश के भावनाओं के अनुसार ऐसे अवसरों पर हम सबके आस पास ही उपस्थित होती है “.(शालिनी कौशल) शालिनी जी बहुत उम्दा लिखा है आपने वास्तविकता तो ये है कि ये इन महापुरषों के नाम पर राजनीती कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं जो इनकी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है..वर्तमान राजनीती के परिप्रेक्ष्य में आपका ये विश्लेषण बेहद सराहनीय है..बहुत बहुत बधाई..


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