! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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ग़ज़ल-सच्चाई ये ज़माने की थोड़ी न मुकम्मल ,[contest ]

Posted On: 27 Jan, 2014 Others,Contest,Celebrity Writer में

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ज़िंदगी उस शख्स की सुकूँ से गुज़र सकी ,
औलाद जिसकी दुनिया में काबिल न बन सकी .
……………………………….
बेटे रहे हैं साथ वही माँ-बाप के अपने ,
बदकिस्मती से नौकरी जिनकी न लग सकी .
…………………………………………..
बेटी करे बढ़कर वही माँ-बाप की खातिर ,
मैके के दम पे सासरे के सिर जो चढ़ सकी .
………………………..
भाई करे भाई का अदब उसी घडी में ,
भाई की मदद उसकी गाड़ी पार कर सकी .
………………………………………..
बहन बने भाई की तब ही मददगार ,
अव्वल वो उससे उल्लू अपना सीधा कर सकी .
…………………………………………..
बीवी करे है खिदमतें ख्वाहिश ये दिल में रख ,
शौहर की शख्सियत से उसकी साख बन सकी .
……………………………………….
शौहर करे है बीवी का ख्याल सोच ये ,
रखवाई घर की दासी से बेहतर ये कर सकी .
…………………………………………
सच्चाई ये ज़माने की थोड़ी न मुकम्मल ,
तस्वीर का एक रुख ही ”शालिनी ”कह सकी .

….
शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Ritu Gupta के द्वारा
February 12, 2014

आदरणीय शालिनी जी विजेता बनने पर हार्दिक बधाई आपकि सभी सभी रचनाये सराहनीय है

R K KHURANA के द्वारा
February 10, 2014

प्रिय शालिनी जी, तृतीय पुरस्कार के लिए बधाई ! राम कृष्ण खुराना

yogi sarswat के द्वारा
January 30, 2014

रिश्तों को आइना दिखाते सार्थक शब्द लिखे हैं आपने शालिनी जी !

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
January 28, 2014

शालिनी जी आपकी दस्तक मुझे आपकी रचनाओं से (आपसे ) रूबरू कर गई .माता पिता के आलावा सभी रिश्तों की आधार शिला ही आपसी स्वार्थ है ,सार्थक ग़ज़ल . आभार , निर्मल  

sadguruji के द्वारा
January 28, 2014

सच्चाई ये ज़माने की थोड़ी न मुकम्मल , तस्वीर का एक रुख ही ”शालिनी ”कह सकी.अच्छी ग़ज़ल बधाई.

Santlal Karun के द्वारा
January 27, 2014

आदरणीया शालिनी जी, अच्छी हिन्दी ग़ज़ल, सार्थक, संवेदनात्मक; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

सौरभ मिश्र के द्वारा
January 27, 2014

बिल्कुल सही समाज का क्या अवलोकन किया आपने कि सच्चाई को कविता मे घोल दिया

Sonam Saini के द्वारा
January 27, 2014

माफ़ कीजियेगा शालिनी जी लेकिन आपकी ये ग़ज़ल कुछ बिखरी बिखरी सी लग रही है, हर शब्द एक दूसरे से अलग अलग सा लग रहा है, और भावो की कमी सी लग रही है ………कृपया अन्यथा न ले ये सिर्फ मेरा मत है …


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