! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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संस्मरण -मेरे डिग्री कॉलिज में मेरा पहला समारोह -[contest ]

Posted On: 24 Jan, 2014 Contest,Celebrity Writer में

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”जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमे रसधार नहीं ,
वह ह्रदय नहीं है पत्थर है जिसमे स्वदेश का प्यार नहीं .”
बचपन से ही राष्ट्रप्रेम से भरी ये पंक्तियाँ ह्रदय में इस कदर बसी हैं कि स्कूल कॉलिज का कोई भी समारोह अर्थात स्वतंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस मैंने कभी नहीं छोड़ा .अव्वल तो इनमे कार्यक्रम के पश्चात् बच्चों को लड्डू बांटे जातें हैं ये लालच भी मन में कम नहीं रहता किन्तु मुख्य थी वह भावना जो इस वक़्त ह्रदय में हिलोरे मरती है तो बस कभी भाषण द्वारा तो कभी अपने प्रिय फ़िल्मी देशभक्ति गीत गाकर मैं इन समारोहों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही .वैसे भी इंटरमीडिएट तक ये उपस्थिति छात्र-छात्राओं के लिए लगभग अनिवार्य ही होती है किन्तु कॉलिज लाइफ में जब आज़ादी मिलती है तब हम अपने स्वतंत्रता संग्राम को भूल जाते हैं और वहाँ जाकर ऐसे समारोहों में शामिल होना अपने समय का व्यर्थ किया जाना मानने लगते हैं इसलिए कॉलिज में इन समारोहों में विद्यार्थी वर्ग की उपस्थिति नगण्य ही रहती है .मैं इस बारे में तब इतना जानती नहीं थी ,मैं तो जैसे इंटर तक इनमे भाग लेती रही वैसे ही जब डिग्री कॉलिज में प्रवेश लिया तो वहाँ भी स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग लेने पहुँच गयी किन्तु ये क्या वहाँ तो कॉलिज कैम्पस खाली था ,थोड़ी देर में मुझे वहाँ प्राचार्य ,प्रवक्ताएं आती दिखायी दी तो जान में जान आयी और तब वहाँ तिरंगा लहराया गया [वैसे शायद हमेशा फहराया जाता होगा मैं ही शायद कुछ समय पूर्व वहाँ पहुँच गयी थी ] और प्राचार्य द्वारा फहराया गया ,सभी ने कुछ न कुछ विचार व्यक्त किये मैंने भी किये और जैसे कि उस दिन कॉलिज में कुछ अन्य गतिविधियां करायी जानी प्रशासन ने निश्चित की होंगी वे भी कार्यी गयी क्योंकि यह एक राजकीय डिग्री कॉलिज था .रेंजर्स के तत्वावधान में मुझ एकमात्र उपस्थित छात्रा से दौड़ लगवायी गयी और राष्ट्रिय सेवा योजना के तत्वावधान में मुझसे घास साफ करायी गयी और फिर जैसा कि हमेशा होता है इन समारोहों का समापन मुझे एक थैली में दो लड्डू दिए गए और इस तरह मेरे डिग्री कॉलिज में मेरा पहला समारोह स्वतंत्रता दिवस के इस तरह आयोजन से सम्पन्न हुआ .
घर आकर मैंने सभी को ये सब बताया तो सभी को मुझ पर हंसी आ रही थी कि मैं बगैर सूचना के कॉलिज गयी ही क्यूँ ?किन्तु मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था सिवाय इसके कि मेरा अपने देश के प्रति जो कर्त्तव्य है उसे अभी मैं जिस तरह से निभा सकती हूँ उसे निभाने ही वहाँ गयी थी और मेरी इस भावना ने उनपर भी असर किया तब जब अगले दिन समाचार पत्र में मेरे क्षेत्र के स्वतंत्रता दिवस समारोहों के समाचारों में मेरे कॉलिज की खबर थी जिसमे मुख्य स्थान मुझे यह कहते हुए कि ”एकमात्र छात्र शालिनी कौशिक की उपस्थिति का समाचार ”दिया गया -

Shalini shikha0743
और अब मेरा स्वयं पर गर्व और भी बढ़गया था और मन गुनगुना रहा था -
”एकला चलो एकला चलो एकला चलो रे ,
तेरी आवाज़ पे कोई न आये तो फिर एकला चलो रे .”

शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

सौरभ मिश्र के द्वारा
January 28, 2014

12 तक का मेरा अनुभव भी ऐसा था मै हर गतिविधि मे भाग लेता था और लोग कहते है कि मै अच्छा वक्तव्य देता हू पर स्नातक कर रहा हू और यहा कोई समारोह नही होता मेरी इच्छा है कि मुझे फिर बोलने का मौका मिले

deepakbijnory के द्वारा
January 27, 2014

कमाल कि सत्य रचना शालिनी जी बधाई

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 27, 2014

अच्छी राह पकड़ी आप ने ! हार्दिक बधाई !

Madan Mohan saxena के द्वारा
January 24, 2014

सुन्दर भाबपूर्ण संस्मरण सादर मदन कभी इधर भी पधारें

DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
January 24, 2014

sach me ye sansmaran rochak to hai ki hamare bharat me rashtriy parv ke prati longon ke bhavon ko bhi prakat karta hai .


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