! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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नारी तू है ही क्या .

Posted On: 19 Jan, 2014 social issues,Junction Forum,Celebrity Writer में

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कई बार पहले भी देख चुकी ‘चक दे इंडिया’ को फिर एक बार देख रही थी .बार बार कटु शब्दों से भारतीय नारी का अपमान किया गया किन्तु एक वाकया जिसने वाकई सोचने को मजबूर कर दिया और भारतीय नारी की वास्तविक स्थिति को सामने लाकर खड़ा कर दिया वह वाक्य कहा था फ़िल्म में क्रिकेट खिलाडी अभिमन्यु सिंह ने चंडीगढ़ की हॉकी खिलाडी प्रीति से ,
”हार जाओगी तो मेरी बीवी बनोगी ,जीत जाओगी तो भी मेरी बीवी बनोगी ऐसा तो नहीं है कि वर्ल्ड कप से से आओगी तो सारा हिंदुस्तान तुम्हारा नाम जप रहा होगा .”
कितना बड़ा सच कहा अभिमन्यु ने और इससे हटकर भारतीय नारी की स्थिति और है भी क्या ,फ़िल्म में काम करती है तो हीरो के बराबर मेहनत किन्तु मेहनताना कम ,खेल में खेलने में बराबर मेहनत किन्तु पुरुष खिलाडी के मुकाबले कम मैच फीस .खेलों में क्रिकेट में पुरुष टीम भी और महिला टीम भी किन्तु पुरुष टीम के पीछे पूरा भारत पागल और महिला टीम के प्रति स्वयं महिला भी नहीं .पुरुष टीम वर्ल्ड कप जीत लाये इसके लिए एक महिला [पूनम पांडे ] निर्वस्त्र तक होने को तैयार जबकि पुरुषों में महिला टीम के प्रदर्शन तक को लेकर कोई क्रेज़ नहीं .
हमारे एक अंकल की बेटी ने जब अंकल से कहा कि आपने हमारी पढाई के लिए कुछ नहीं किया जो किया मम्मी ने किया तो वे कहते हैं कि वह क्या कर सकती थी ,वह क्या एक भी पैसा कमाती थी ? ये है एक नारी के अपनी ज़िंदगी अपने परिवार के लिए ,बच्चों के लिए स्वाहा कर देने की कीमत कि उसके लिए उसके परिवार तक में उसके बीमार पड़ने पर कह दिया जाता है ”कि अपने कर्म भुगत रही है ”जबकि वही नारी जब अपने पति को बीमारी की गम्भीर अवस्था में देखती है तो अपनी ताकत से बाहर अपनी क्षमता जाग्रत करती है और सावित्री बन सत्यवान के प्राण तक यमराज से छीन लाती है .
आज हर तरफ महिलाएं छायी हुई हैं ,घर तो उनका कार्यक्षेत्र है ही और उनके बिना घर में गुजारा भी नहीं है ,गावों में खेतों में महिलाएं पुरुषों के साथ खेत पर मेहनत करती हैं और घर के भी सारे काम निबटाती हैं .शहरों में नौकरी भी करती हैं और सुबह को काम पर जाने से पहले और काम से आने के बाद भी घर के काम निबटाती हैं और कितने ही काम इनके ऑफिस से छुट्टी के दिन इकट्ठे रहते हैं अर्थात नौकरी से भले ही अवकाश हो किन्तु उनके लिए अवकाश नाम की चीज़ नहीं .छुट्टी वाले दिन जहाँ आदमी पैर पसार कर सोते हैं या सिनेमा हाल में फ़िल्म देख दोस्तों के साथ हंसी मजाक में व्यतीत करते हैं वहीँ महिलाएं हफ्ते भर के इकट्ठे गंदे कपडे धोती हैं ,मसाले तैयार करती हैं ,कपड़ों पर प्रैस आदि का काम करती हैं और इस सबके बावजूद उसकी अक्ल घुटनों में ,वह करती ही क्या है ,ऐसे विशेषणों से नवाज़ी जाती है ,उसी के जन्म पर आंसू बहाये जाते हैं और रोने वालों में पुरुषों से आगे बढ़कर नारियां ही होती हैं .
आज तक न तो पुरुष ने नारी की कद्र की और न नारी ने स्वयं नारी की ,दोनों के लिए ही वह बेकार है और ऐसी बेकार है जिसकी बहु रूप में तो आवश्यकता है बेटे का घर बसाने के लिए किन्तु बेटी रूप में नहीं ,माँ रूप में तो ज़रुरत है बच्चे के पालन पोषण के लिए किन्तु बच्चे के रूप में नहीं और इसलिए सही कहा अभिमन्यु सिंह ने कि नारी की एक ही नियति है ”पुरुष की गुलामी ”स्वयं करे या अपने परिजनों के कहने पर करे ,अरैंज करे या लिव इन में रहे हर हाल में उसे यही करना है और यदि नहीं करती है तो कुल्टा कह समाज में तिरस्कृत किया जाता है और ऐसे परिणाम से बचने के लिए भी वह पुरुष के ही वश में होती है और इसलिए शायद यही प्रार्थना करती है कि-हे प्रभु अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो .”
शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vaidya surenderpal के द्वारा
January 24, 2014

सार्थक और विचारणीय आलेख शालिनी कौशिक जी।

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 23, 2014

एक सर्वमान्य सच ! ऐसे में ये पंक्तियाँ सहज ही मानस-पटल पर कौंध जाती हैं ….. ” अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ! आँचल में है दूध और आँखों में पानी !!शालिनी जी सादर ! सप्रेम !

dhirchauhan72 के द्वारा
January 20, 2014

बड़ी मार्मिक व्याख्या है ………..शरीफ आदमी के लिए मुसीबत भी बनती हुई देखी गयी हैं ये नारियां ! जो इन्हें कमजोर समझता है हमेशा गलती करता है ……….लेकिन सामजिक हकीकत यही है …….सबसे बड़ी बात है कि जब तक परिवार व्यवस्था है तब तक नारी की सामाजिक स्थिति यही रहेगी ! सहयोगी,सहभागी से हट कर जितनी भूमिकाओं में नारी है उसे सम्मान के बदले त्याग करना पड़ता है त्याग करने के लिए नारी किन्हीं भी स्थितियों में तैयार रहती है !!

    January 20, 2014

    चलिए आप राजनीति से सामाजिक मुद्दे पर तो आये .बिलकुल सही विचार दिए हैं आपने .आभार

January 19, 2014

शालिनी जी मैंने भी चक द इंडिया देखा मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा जैसा आपके प्रस्तुति में है । बहुत ही अच्छा भाव प्रकट किया है आपने , बहुत - बहुत बधाई ।


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