! मेरी अभिव्यक्ति !

तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

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नारी :हमेशा बेघर ,बेचारी [contest ]

Posted On: 5 Jan, 2014 कविता,Contest,Celebrity Writer में

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निकल जाओ मेरे घर से
एक पुरुष का ये कहना
अपनी पत्नी से
आसान
बहुत आसान
किन्तु
क्या घर बनाना
उसे बसाना
सीखा कभी
पुरुष ने
पैसा कमाना
घर में लाना
क्या मात्र
पैसे से बनता है घर
नहीं जानता
घर
ईंट सीमेंट रेत का नाम नहीं
बल्कि
ये वह पौधा
जो नारी के त्याग, समर्पण ,बलिदान
से होता है पोषित
उसकी कोमल भावनाओं से
होता पल्लवित
पुरुष अकेला केवल
बना सकता है
मकान
जिसमे कड़ियाँ ,सरिये ही
रहते सिर पर सवार
घर
बनाती है नारी
उसे सजाती -सँवारती है
नारी
उसके आँचल की छाया
देती वह संरक्षण
जिसे जीवन की तप्त धूप
भी जला नहीं पाती है
और नारी
पहले पिता का
फिर पति का
घर बसाती जाती है
किन्तु न पिता का घर
और न पति का घर
उसे अपना पाता
पिता अपने कंधे से
बोझ उतारकर
पति के गले में डाल देता
और पति
अपनी गर्दन झुकते देख
उसे बाहर फेंक देता
और नारी
रह जाती
हमेशा बेघर
कही जाती
बेचारी
जिसे न मिले
जगह उस बगीचे में
जिसकी बना आती वो क्यारी- क्यारी .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
January 9, 2014

ये शब्द हमेशा सही नहीं होते आदरणीय शालिनी जी !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
January 9, 2014

संवेदनशील रचना, सादर।

1sm1 के द्वारा
January 8, 2014

पीढ़िया गुजर गयी ये समझाते हुये पर कोई नही सुधरा,कोई नही बदला

vikashsangwan के द्वारा
January 5, 2014

जा कौण सी बिन तेरे ,माहरी भैंस दूध नै नाटेगी तू पीछा छोड़ देवेगी तो माँ मेरी प्रसाद बाटेंगी मेरे बरगा शरीफ गाबरू तैंने कही भी ना मिलेगा देख लिए मेरे घर के तू एक दिन चक्कर काटेगी तैने नही उस घड़ी नै रोऊ सूं, जद इकरार होया ना मालूम था छाती मेरी न्यू बीच में तै पाटेगी बेबसी की धरती पे एक दिन पानी फूटके निकलेगा बता कितने दिन तू आंसुआ नै निकलन तै डाटेगी सबने “देसी हरयाणवी ” ना लगाइए इस रंग बदलती दुनिया में जा मैं देखूँगा किसकी धडकन तेरे तलवे चाटेगी

bhanuprakashsharma के द्वारा
January 5, 2014

सच को आइना दिखाती रचना। 


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